भुला दिया चौरी-चौरा के शहीदों का योगदान

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Edited By Amrit Vichar
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हमेशा से अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य भारत का आर्थिक दोहन ही था, लेकिन इसके लिए उन्होंने शुरू से ही ऐसे हथकंडे अपनाए, जिनसे देश के राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक स्तर बुरी तरह प्रभावित होने लगे थे। भारतीय किसानों पर ब्रिटिश नीतियों का बहुत ही भीषण प्रभाव पड़ रहा था। अंग्रेज उन्हें मजबूर करते कि वे …

हमेशा से अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य भारत का आर्थिक दोहन ही था, लेकिन इसके लिए उन्होंने शुरू से ही ऐसे हथकंडे अपनाए, जिनसे देश के राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक स्तर बुरी तरह प्रभावित होने लगे थे। भारतीय किसानों पर ब्रिटिश नीतियों का बहुत ही भीषण प्रभाव पड़ रहा था।

अंग्रेज उन्हें मजबूर करते कि वे अपनी पारंपरिक फसलें छोड़कर केवल वे फसलें उगाएं, जिनसे अंग्रेजी हुकूमत का खजाना भरा जा सके, जिनसे ब्रिटिश उद्योगों के लिए कम कीमत पर कच्चा माल जुटाया जा सके। नतीजतन, किसानों के पास अनाज की कमी होने लगी, वहीं बड़ी मात्रा में लगान भरने से उनकी पूंजी भी नष्ट होने लगी। चारों ओर गरीबी और भुखमरी फैलने लगी।

18वीं सदी से शुरू हुआ बर्बादी का सिलसिला हमें 20वीं सदी की शुरुआत तक ले आया था, जब सोने की चिड़िया कहलाने वाला हमारा देश गरीबी, भुखमरी का घर बन चुका था। भेदभाव की नीतियां भी अपनाकर अंग्रेज भारतीयों की एकता को भी तोड़ते रहते थे। पहले सांप्रदायिक आधार पर बंग-विभाजन किया गया, फिर विश्व-युद्ध में भारतीयों का भरपूर सहयोग पाने के बदले उन्हें जलियांवाला बाग की वीभत्स त्रासदी दी।

विरोध के स्वर उपजते नहीं कि उन्हें कुचल दिया जाता। न जाने कितने भारतीयों को बीच बाजार पेड़ों पर लटकाकर फांसी दे दी जाती और उनका नेतृत्व कर रहे साहसियों को या तो जेलों में डालकर प्रताड़ित किया जाता या फिर सीधे मौत के घाट उतार दिया जाता। जन-जन पीड़ा और आक्रोश से जल रहा था, दमन की आग से देश का अंतर्मन झुलस रहा था, जब 1920 में गांधी जी के असहयोग आंदोलन ने भारतीयों के हृदय में आशा की नई किरण जगाई। असहयोग के चलते रोजी-रोटी के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा भी दांव पर लगी हुई थी। दिलों में उबाल बढ़ने लगा था, फिर भी गांधी जी की पुकार पर शांतिपूर्ण आंदोलन ही जारी रहा।

सितंबर 1920 से फरवरी 1922 आ चुका था, इन डेढ़ वर्षों में देशवासियों को परिणाम में केवल आर्थिक तंगी और बीमारियां ही मिल रही थीं। पीड़ित जनता फिर भी धीरज के साथ शांतिपूर्ण मार्च निकाल रही थी, जब गोरखपुर के चौरी-चौरा क्षेत्र में अनहोनी घट गई। पुलिस ने उनके दो नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। भीड़ पुलिस थाने की ओर शांतिपूर्ण ढंग से बढ़ रही थी, कि शासन के आदेश पर पुलिस ने गोलियां बरसा दीं। भूख और गरीबी के हालातों में औपनिवेशिक गुलामी से आजादी पाने का सपना अब उद्विग्न होने लगा था। कहीं न कहीं जलियांवाला बाग की घटना की पुनरावृत्ति भी डरा रही होगी।

गोलीबारी से बेकाबू भीड़ पीछे हटने के बजाय पुलिस थाने की ओर बढ़ती रही और अनेक आंदोलनकारियों की मौत हो गई, अनेक घायल हो गए। इसी बीच पुलिस की गोलियां खत्म हो गईं और वे थाने में छुप गए। आक्रोश, भय के बहाव में भीड़ का धीरज खो गया और उन्होंने अपनी मशालों से पुलिस थाने में आग लगा दी। उधर थाने के अंदर भी अपने भारतीय पुलिसकर्मी ही दम तोड़ रहे थे और इधर, थाने के बाहर आम भारतीय जनता दम तोड़ रही थी। साथ ही दम तोड़ रहा था- आजादी का वह सपना, जो करोड़ों दिलों में असहयोग आंदोलन बनकर पल रहा था।

नियति ठठाकर हंस रही होगी, जब करोड़ों दिलों से रक्तिम अश्रु-धारा बह रही होगी। असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। चौरी-चौरा कांड के आरोपियों पर मुकदमा चला। वकालत छोड़ चुके पंडित मदन मोहन मालवीय ने आरोपियों को बचाने के लिए कमर कसी और मृत्युदंड के 172 आरोपियों में से 153 को बचाने में सफल हुए। सच है कि एक और सपना टूटा था, लेकिन हौसले हारे नहीं थे। बल्कि, आम भारतवासियों के इस जोश ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई राह दिखाई, एक नई दिशा दी। इतिहास के पन्नों में खो गए इन अमर शहीदों की कुर्बानियां बेकार नहीं गई।

युगों पुरानी सभ्यता और संस्कारों से सिंचित भारत की इस धरती ने आज स्पष्ट संदेश दिया था- “अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:।” सच है कि अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, किंतु अधर्म का नाश भी अनिवार्य है। अहिंसा और सद्भाव ही है धर्म हमारा, किंतु कमजोर बन अत्याचार सहना भी अधर्म ही है। विदेशी आक्रांताओं का साथ दे, ऐसा भाई भी, किसी कीमत पर अब हमें स्वीकार नहीं।

यज्ञ की ज्वाला सी, चौरी-चौरा की धरती से उठीं क्रांति की चिंगारियां देश के कोने-कोने में सुलग उठीं। बालक, युवा, वृद्ध, महिला हों या पुरुष, सभी स्वाधीनता के उस यज्ञ में आहुति देने उमड़ पड़े। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जैसे संगठनों का गठन हुआ और राजगुरु, भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, चंद्रशेखर आजाद, ठाकुर रोशन सिंह, सूर्यसेन जैसे अनेक राष्ट्रवादी आजादी की राह में परवान होने निकल पड़े।

काकोरी में ब्रिटिश खजाना लूटकर तो कभी दिल्ली असेम्बली में बम गिराकर, पूरे देश में जगह-जगह, विरोध के स्वर तेज होने लगे। देशी सत्ता को उखाड़ फेंकने की कोशिशें बढ़ने लगीं। करोड़ों भारतवासियों के संघर्ष और बलिदान के बाद, अनेक यातनाएं सहने के बाद, अनगिनत शहीदों के त्याग के बाद, आखिरकार देश आजाद हुआ। चौरी-चौरा के गुमनाम शहीदों को आजादी के 25 साल बाद पहली बार पहचान मिली, जब 1973 में स्थानीय लोगों ने खुद भारत मां के इन सपूतों की याद में एक स्मारक का निर्माण करवाया, जिन्होंने आजादी के प्रयासों को एक नई दिशा दी।

आज सौ साल बाद, जब चौरी-चौरा में भी बहुत कुछ बदल गया है। यहां की मिट्टी आज भी अपने साहसी सपूतों के रक्त से नम है। भारत की आजादी के लिए देश पर कुर्बान होने वाले सैकड़ों राष्ट्रभक्त आज भी गुमनामी के अंधेरों में गुम हैं। इस मिट्टी में मिट जाने वाले अनगिनत शहीद आज आजाद भारतवासियों के बीच अपनी शहादत की पहचान ढूंढ़ रहे हैं, जिनके रक्त ने कभी इस धरती को नहलाया था, आज उनके खामोश आंसू इसे भिगो रहे हैं।

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