हल्द्वानी: हालात अच्छे नहीं थे ,पर हौसलें बुलंद थे मां-बाप व बच्चों के भी ..इसीलिए आज कामयाब हैं
आदित्य प्रकाश पंत, हल्द्वानी। हल्द्वानी में कभी सिलाई-बुनाई और गाय का दूध बेचकर बच्चों का पालन-पोषण और पढ़ाई करवाने वाले राजेंद्र प्रसाद मिश्रा और प्रेमा मिश्रा भी किसी मिसाल से कम नहीं हैं। मिश्रा दंपति ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए बच्चों की ऐसी फ्यूचर प्लानिंग बनाई कि तीनों बच्चों ने बिना कोचिंग के …
आदित्य प्रकाश पंत, हल्द्वानी। हल्द्वानी में कभी सिलाई-बुनाई और गाय का दूध बेचकर बच्चों का पालन-पोषण और पढ़ाई करवाने वाले राजेंद्र प्रसाद मिश्रा और प्रेमा मिश्रा भी किसी मिसाल से कम नहीं हैं। मिश्रा दंपति ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए बच्चों की ऐसी फ्यूचर प्लानिंग बनाई कि तीनों बच्चों ने बिना कोचिंग के कामयाबी हासिल कर ली। आज उनकी छोटी बेटी किरन मिश्रा बागेश्वर के डिग्री कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है। बड़ी बेटी वंदना मिश्रा टीचर और बेटा कौशिक मिश्रा भारतीय वायु
सेना में चंडीगढ़ में तैनात है।
श्याम विहार तल्ली बमौरी मुखानी निवासी प्रेमा मिश्रा ने बताया कि वर्ष 1988 के दौरान उनकी आर्थिक स्थिति ठीक
नहीं थी। पति राजेंद्र प्रसाद मिश्रा गांधी आश्रम में नौकरी करते हैं। सन 1995 में वह पिथौरागढ़ में थे। वहां पर कम वेतन में तीन
बच्चों का पालन पोषण करना और पढ़ाई करवा पाना संभव नहीं
हो पा रहा था।
इस समस्या से उभरने के लिए उन्होंने हल्द्वानी ट्रांसफर करने के लिए फाइलें दौड़ाई तो कुछ समय बाद हल्द्वानी ट्रांसफर भी मिल गया। नए शहर में आते ही दोनों के सामने तीन बच्चों की परवरिश और भरण-पोषण की चुनौती थी। हल्द्वानी गांधी आश्रम में आने के बाद प्रेमा मिश्रा ने सिलाई-बुनाई के साथ-साथ गाय पालने का मन बनाया और एक गाय खरीद ली। छोटी की जगह में उन्होंने दिन-रात मेहनत कर दूध बेचा और बच्चों को पढ़ाया। दोनों पति-पत्नी के मजबूत इरादों के आगे परेशानियां भी पैर नहीं पसार सकीं। उनका कहना है कि बच्चों को शिक्षा के माध्यम से ही बेहतर बनाया जा सकता है।
जब स्वास्थ्य बिगड़ा तब भी बनाए रखा संयम, इलाज करवाया और बच्चों को भी देखा
प्रेमा मिश्रा का 2007 में अचानक स्वास्थ्य बिगड़ गया, उनके पैरों में दिक्कत के चलते वह छह माह तक बैड से नीचे नहीं उतर सकीं। डॉक्टर ने उन्हें 1 साल तक बेड पर रहने को कहा, लेकिन इस दौरान भी उन्होंने अपना हौसला बनाए रखा और बच्चों से चिंता न करने की बात कही। तब बच्चे भी बड़े हो चुके थे, मां की सेवा के लिए बच्चों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान उन्हें अपनी गाय भी बेचनी पड़ी थी, लेकिन अब आर्थिक स्थिति पहले से कुछ ठीक हो चुकी थी। बच्चे भी ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्चा निकालने लायक बन चुके थे। प्रेमा मिश्रा ने बताया कि इसके बाद वह करीब 1 साल तक बिस्तर पर रहीं, लेकिन अब स्वास्थ्य सामान्य है। उनका कहना है कि हर इंसान के जीवन में मुश्किलें आतीं है, लेकिन इनसे निपटने का तरीका सबका अलग होता है। कोशिश यह रहनी चािहए कि इस दौरान अपने संयम को बनाएं रखें। यही संयम इंसान को सफलता के द्वार तक पहुंचा देता है।
संघर्ष का समय कठिन जरूर होता है, लेकिन उसका फल हमेशा मीठा होता है। इसलिए बच्चों को अपनी पढ़ाई पूरी ईमानदारी के साथ करनी चाहिए। मेहनत अच्छी है तो सफलता जरूर मिलती है। कभी-कभी संघर्ष लंबा हो जाता है, ऐसे में बच्चों को संयम बनाकर रखने की जरूरत होती है। यदि आधी तैयारी में हौसला टूट गया तो फिर मुकाम पाना मुश्किल हो जाता है।
-किरन मिश्रा, असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी), पीजी कॉलेज बागेश्वर



