रक्षा आत्मनिर्भरता

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Edited By Amrit Vichar
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चीन और पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार लगातार कर रहे हैं। ऐसे में, हमें अपने देश की सुरक्षा के लिए भी अत्याधुनिक प्रतिरक्षा तंत्र विकसित करना जरूरी है। इसके लिए सेना को आधुनिक हथियारों व युद्धक तकनीक से लैस करना वक्त की जरूरत है। मौजूदा दौर में युद्धक तकनीकों में तेजी से बदलाव आया …

चीन और पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार लगातार कर रहे हैं। ऐसे में, हमें अपने देश की सुरक्षा के लिए भी अत्याधुनिक प्रतिरक्षा तंत्र विकसित करना जरूरी है। इसके लिए सेना को आधुनिक हथियारों व युद्धक तकनीक से लैस करना वक्त की जरूरत है। मौजूदा दौर में युद्धक तकनीकों में तेजी से बदलाव आया है। आधुनिक हथियारों के बिना सीमाओं को मजबूती दे पाना संभव नहीं है।

कहा जा सकता है कि चुनौतियों को देखते हुए तैयारियों में कई तरह के बदलाव लाने की जरूरत है। चीन और पाकिस्तान से मिल रही चुनौतियां के मद्देनजर सैन्य आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ना होगा। हालांकि चीन से मिल रही चुनौती का सामना भारत आसानी से कर लेगा, लेकिन जब पाकिस्तान इसके रास्ते में आएगा तो संभलकर चलने की जरूरत पड़ेगी। इसलिए भारत को अब हमेशा एक नई चुनौती से निबटने के लिए तैयार रहना चाहिए। लद्दाख में चीनी अतिक्रमण, खासकर गलवान घाटी में दोनों देशों के बीच हुए संघर्ष के बाद हथियार खरीद में तेजी आई है।

वर्ष 2021-22 के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए 4.78 लाख करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। पिछले साल यह राशि 4.71 लाख करोड़ रुपये थी। मौजूदा चुनौतियों के मद्देनजर रक्षा बजट में करीब 1.4 फीसदी की वृद्धि पर्याप्त नहीं कही जा सकती है। फिर भी सैन्य आधुनिकीकरण के लिए पूंजीगत परिव्यय को पर्याप्त बढ़ाया गया है ताकि तात्कालिक रक्षा चुनौतियों का मुकाबला करने में परेशानी न आए। वहीं रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इससे देश में रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी।

नि:स्संदेह जब देश में हवाई जहाज या बड़े अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण होगा तो उसके लिए आवश्यक कलपुर्जे व जरूरी सामग्री उपलब्ध कराने वाले छोटे, लघु व मध्यम दर्जे के उद्योगों के विकास को भी मदद मिलेगी। फिर आत्मनिर्भरता की एक नई श्रृंखला तैयार होगी लेकिन रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बात तब तक बेमानी रहेगी जब तक इस क्षेत्र में शोध-अनुसंधान व गुणवत्ता के स्तर पर निर्माण को बढ़ावा नहीं दिया जाता।

निस्संदेह मेक इन इंडिया मुहिम के लिए कारगरतंत्र विकसित करने के लिए व्यापक पैमाने पर तैयारी करनी होगी। वास्तव में भारत में आज जो रक्षा उपकरण बन रहे हैं, उनमें से कई के पार्ट विदेशों से बन कर आते हैं। साफ है कि जब तक विदेशी कंपनियों का रक्षा सौदों में हस्तक्षेप रहेगा, तब तक रक्षा उपकरणों में आत्मनिर्भरता संभव नहीं है।