तुलना उचित नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के प्रति नजरिया किसी से छुपा नहीं है। दावे भले बड़े-बड़े किए जाएं और सोच में बदलाव की बातें कितनी ही क्यों न हों लेकिन समाज के रवैये में जितना बदलाव आना चाहिए, वो नहीं आ रहा। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सोमवार को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने …

पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के प्रति नजरिया किसी से छुपा नहीं है। दावे भले बड़े-बड़े किए जाएं और सोच में बदलाव की बातें कितनी ही क्यों न हों लेकिन समाज के रवैये में जितना बदलाव आना चाहिए, वो नहीं आ रहा।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सोमवार को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा कि ऐसा माहौल सुनिश्चित करने की जरूरत है, जिसमें महिलाएं शब्दों और कार्यों, दोनों तरह से अपनी पूरी क्षमता के साथ खुद को व्यक्त कर सकें। उपराष्ट्रपति की बात का समर्थन किया जाना चाहिए। हमारे सामने ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जब महिलाओं को उनके प्रति सकारात्मक और उत्साहजनक माहौल मिला है। तब-तब उन्होंने ऐसा कर दिखाया है, जो पुरुषों के लिए भी संभव नहीं हुआ है। देश-दुनिया में बहुत सारी महिलाएं हैं, जिन्होंने नारी शक्ति को साबित किया है।

असल में, महिलाओं और पुरुषों में तुलना करना ही गलत है। महिलाएं सृजन में सहायक हैं और पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर घर-परिवार में अहम भूमिका निभाती हैं लेकिन आज भी जब मेरी बेटी, बेटे जैसी या मेरी बेटी बेटे से बढ़कर है या फिर यह महिला तो मर्दानी है, जैसी बातें कहीं जाती हैं तो महिलाओं की तुलना पुरुषों से होती ही है। यह तुलना ही पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की कमतर स्थिति वाली सोच को स्वाभाविक रूप से पैदा करती है।

बेहतर यह है कि हम महिलाओं और पुरुषों के बीच तुलना ही न करें। बल्कि महिलाओं के लिए पुरुषों से ज्यादा उत्साहजनक माहौल दें, तो एक दिन महिला-पुरुष में भेदभाव की सोच खुद-ब-खुद दूर होने लगेगी।

जहां तक महिला अपराधों की बात है तो तमाम कानून के बावजूद महिलाओं के प्रति अपराध कम नहीं हो रहे। यह चिंता का विषय है और महिला अपराध कैसे थमेंगे? यह गहरे मंथन का विषय है। िनर्भया कांड के बाद फांसी की सजा का प्रावधान कर दिया गया। पाक्सो एक्ट बनाया गया लेकिन अपराध फिर भी नहीं थमे। असल, में अपराध एक प्रवृत्ति है जो किसी भी व्यक्ति में मनोविकारों और कुसंस्कारों से उत्पन्न होती है।

प्राचीन काल में नैतिक शिक्षा और संस्कारों पर इसलिए जोर दिया जाता था ताकि व्यक्ति में बुरी प्रवृत्तियां घर न कर पाएं। वह अंत: करण से नैतिक बने। सिद्धांतवादी बने और लोक-परलोक के भय से ही सही कोई गलत कार्य न करे लेकिन अब न तो वैसी शिक्षा रही है, न ही घरों से वैसे संस्कार हर िकसी को दिए जाते हैं। इस पर मंथन की आवश्यकता है।