अनाथ रोगों की सुध
देश में दुर्लभ बीमारियों के लिए राष्ट्रीय नीति-2021 की घोषणा की गई है। दुर्लभ रोग एक जटिल मुद्दा है और इससे संबंधित चिकित्सीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी अभाव बना हुआ है। देश में 450 दुर्लभ बीमारियों के करीब सात करोड़ मरीज हैं। इनमें 50 प्रतिशत बच्चे हैं। दुर्लभ रोगों का शीघ्र निदान विभिन्न कारकों …
देश में दुर्लभ बीमारियों के लिए राष्ट्रीय नीति-2021 की घोषणा की गई है। दुर्लभ रोग एक जटिल मुद्दा है और इससे संबंधित चिकित्सीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी अभाव बना हुआ है। देश में 450 दुर्लभ बीमारियों के करीब सात करोड़ मरीज हैं। इनमें 50 प्रतिशत बच्चे हैं। दुर्लभ रोगों का शीघ्र निदान विभिन्न कारकों के कारण एक बड़ी चुनौती है। इसमें चिकित्सकों के बीच जागरूकता की कमी, पर्याप्त जांच और नैदानिक सुविधाओं की कमी आदि शामिल हैं। दुर्लभ रोग से पीड़ित रोगियों की संख्या काफी कम होने के कारण दवा उत्पादक कंपनियां इन रोगों के लिए दवाएं नहीं बनाती हैं क्योंकि इसकी बिक्री बहुत कम होती है। इसलिए उन्हें ‘अनाथ रोग’ भी कहा जाता है।
देश में काफी समय से दुर्लभ बीमारियों की रोकथाम और प्रबंधन के लिए एक व्यापक नीति बनाने की मांग की जाती रही है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने जुलाई 2017 में भी दुर्लभ बीमारी के इलाज के लिए नीति जारी की थी। लेकिन उसमें स्पष्टता नहीं होने की वजह से राज्यों ने ऐतराज जताया था। अब घोषित की गई राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य दवाओं के देशी अनुसंधान और इसके स्थानीय उत्पादन पर अधिक ध्यान देने के साथ दुर्लभ बीमारियों के इलाज की लागत को कम करना भी है। देश में आठ सेंटर आफ एक्सीलेंस बनाए गए हैं, उनमें लखनऊ का संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान भी शामिल है।
इसका उद्देश्य दुर्लभ बीमारियों की रोकथाम और उपचार के लिए स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं को मजबूत करना है। इन संस्थानों को पांच-पांच करोड़ की आर्थिक सहायता दी जाएगी। साथ ही इन बीमारियों का डेटा जुटाने के लिए आईसीएमआर के तहत राष्ट्रीय अस्पताल रजिस्ट्री भी बनाई जाएगी। इससे देश के भीतर दुर्लभ बीमारियों से संबंधित अनुसंधान और विकास के लिए पर्याप्त डेटा उपलब्ध हो सकेगा। नीति में कारपोरेट कंपनियों से मदद लेने की व्यवस्था भी की गई है। सरकार एक डिजिटल प्लेटफार्म के जरिये वैकल्पिक फंडिंग सिस्टम भी बनाएगी।
उम्मीद की जानी चाहिए कि नीति में किए गए प्रावधानों से दुर्लभ रोगों के निदान के लिए अब अनुसंधान एवं विकास पर बल दिया जाएगा। दुर्भाग्यवश सरकारों की अब तक की उपेक्षित दुर्लभ रोग नीति से इस बात को बल मिल रहा है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संख्याओं का खेल है। इसलिए गैर-भेदभावपूर्ण आदर्शों पर एक नई नीति की जरुरत महसूस की जा रही थी। सरकार ने इसके जरिए पीड़ितों की वित्तीय समस्याओं को कम करने का काम भी किया है। साथ ही नागरिकों के साथ समान व्यवहार करने को कर्तव्य भी पूरा किया जा सकेगा।
