टीका नीति पर सवाल

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Edited By Amrit Vichar
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सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केंद्र की मौजूदा टीका नीति से असमानता पैदा होगी। हालांकि तीन सदस्यीय पीठ का यह फैसला मौजूदा नीति की संवैधानिकता पर नहीं हैं। पीठ ने कहा है कि जिस तरह से मौजूदा नीति तैयार की गई है उससे संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जन स्वास्थ्य के अधिकार …

सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केंद्र की मौजूदा टीका नीति से असमानता पैदा होगी। हालांकि तीन सदस्यीय पीठ का यह फैसला मौजूदा नीति की संवैधानिकता पर नहीं हैं। पीठ ने कहा है कि जिस तरह से मौजूदा नीति तैयार की गई है उससे संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जन स्वास्थ्य के अधिकार के लिए हानिकारक परिणाम होंगे। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकारों के प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और वैक्सीन के नए निर्माताओं को आकर्षित करने के नाम पर बातचीत के लिए बाध्य करने से टीकाकरण वाले 18 से 44 साल के उम्र समूह के लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।

आबादी के अन्य समूहों की तरह इस उम्र समूह में वे लोग भी शामिल हैं जो बहुजन हैं या दलित और हाशिए के समूहों से संबंधित हैं। गौरतलब है कि टीकाकरण अभियान पर पहले दिन से राजनीति जारी है। शुरू में कोरोना वैक्सीन की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े किए गए। फिर उसके प्रभाव और क्रमबद्ध तरीके से आयुवर्ग के लिए टीकाकरण की सुविधा को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा।

केंद्र सरकार ने टीकाकरण की नई नीति के तहत सभी लोगों को वैक्सीन लगाने की इजाजत दी थी। इसके साथ ही सरकार ने निजी अस्पतालों और राज्य सरकारों को वैक्सीन कंपनियों से सीधे टीका खरीदने को भी कहा गया। नई नीति के तहत कंपनियां वैक्सीन सप्लाई का 50 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार को देंगी, जबकि बाकी 50 फीसदी टीके वे राज्य सरकारों को सप्लाई करने और खुले बाजार में बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। इस बिक्री के लिए वैक्सीन की कीमतें तय करने का अधिकार भी निजी कंपनियों को ही दे दिया गया है।

इस छूट के तहत दोनों कंपनियों ने जब अपनी वैक्सीन के बढ़े हुए दामों का एलान किया तो कई राज्य सरकारों ने इसे महामारी के बीच मुनाफाखोरी की शर्मनाक कोशिश बताते हुए आलोचना की। कांग्रेस का आरोप था कि वैक्सीन कंपनियां केद्र सरकार की शह पर मुनाफाखोरी कर रही हैं। राज्य सरकारों का कहना है कि उन्हें भी वैक्सीन उसी कीमत पर मिलनी चाहिए, जिस पर केंद्र सरकार को मिलती है।

सही बात है राज्य सरकारें भले ही टीके की कीमत सीधे तौर पर जनता से वसूल न करें, लेकिन वे जो भी भुगतान कंपनियों को करेंगी उसका बोझ टैक्स की शक्ल में आखिरकार तो आम लोगों पर ही पड़ेगा। शीर्ष अदालत का कहना है कि पहली नजर में इससे लोक स्वास्थ्य के अधिकार के लिए हानिकारक नतीजे होंगे और असमानता को बढ़ावा मिलेगा। इस दृष्टि से सरकार को टीका मूल्य नीति पर फिर से गौर करना ही चाहिए।