चौदह का चमत्कार
अयोद्धया में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, त्रिकालदर्शी परमगुरु वशिष्ठ जी ने अत्यंत शुभ मुहूर्त निकाला था। ऐसा मुहूर्त जिसमें राज्याभिषेक होने से श्रीराम संसार के सर्वाधिक प्रतिष्ठित व सर्वमान्य राजा की ख्याति को उपलब्ध होंगे, किंतु विचित्रता देखिए ठीक उसी मुहूर्त में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला। …
अयोद्धया में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, त्रिकालदर्शी परमगुरु वशिष्ठ जी ने अत्यंत शुभ मुहूर्त निकाला था। ऐसा मुहूर्त जिसमें राज्याभिषेक होने से श्रीराम संसार के सर्वाधिक प्रतिष्ठित व सर्वमान्य राजा की ख्याति को उपलब्ध होंगे, किंतु विचित्रता देखिए ठीक उसी मुहूर्त में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला।
सर्वसमर्थ गुरु वशिष्ठ जिनके लौकिक-पारलौकिक ज्ञान के समक्ष मनुष्य ही नहीं देवता भी नतमस्तक रहा करते थे, जिन्हें समस्त ब्रह्मांड में मात्र भवितव्यता बताने वाले गुरु की नहीं अपितु भवितव्यता बनाने वाले गुरु की मान्यता प्राप्त थी, उनके शोधे गए अति शुभ मुहूर्त में अयोध्या को मनचाहा नहीं, अनचाहा परिणाम मिला था। इससे सम्पूर्ण अयोध्या में निराशा का वातावरण छा गया। गुरु, उनके ज्ञान, आस्था, विश्वास सभी पर प्रश्नचिन्ह लग गया था।
किंतु श्रीराम प्रकृति पूजक थे वे नीतिगत निर्णय और नियति की इच्छा के मर्म को भलीभांति समझते थे इसलिए वे नियति के प्रति स्वीकार के भाव से भरे हुए थे, वे जानते थे कि नियति के प्रत्यक्षतः अकल्याणकारी दिखाई देने वाले निर्णय वस्तुतः अत्यंत कल्याणकारी होते हैं। श्रीराम जानते थे कि मनचाहे परिणाम मनुष्य के पुरुषार्थ की घोषणा होते हैं किंतु अनचाहे परिणाम मनुष्य के पराक्रम को बढ़ाने का कार्य करते हैं। श्रीराम जानते थे की-
“मनचाही में ख़लल है, प्रभु चाही तत्काल।
बलि चाही आकाश को, भेज दिओ पाताल॥”
इसलिए उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक स्वयं को 14 वर्षों के लिए अयोध्या से अलग कर लिया, उनके हृदय में अटल विश्वास और परम संकल्प था वनवास के इन्हीं 14वर्षों में उन्होंने समस्त असुरों सहित महान शक्तिशाली असुराधिपति रावण को पराभूत किया।
महाबली पांडवों को भी 12 वर्ष का वनवास व एक वर्ष का अज्ञात मिला, इसी काल में उन्होंने अपनी संकल्प शक्ति और विश्वास का नवसृजन किया। उन्होंने अपने लक्ष्य का, अपनी आस्था का, क्षमता का विस्तार किया इसके बाद उन्होंने दूसरों की भूमि व भार्या का हरण करने वाले आततायी दुर्योधन और उसकी समस्त खलमंडली का संहार किया।
चंद्रमा जिसे महादेव शिव अपने मस्तक पर धारण करते हैं वह भी प्रत्येक 14 दिन में पक्ष बदलता है, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
कोरोना के इस अनचाहे भीषण काल में भी 14 दिन के कोरंटाइन का विधान है, यह एक हिसाब से वनवास ही होता है। ये 14 दिन बहुत कठिन होते हैं ये हमारी संकल्प शक्ति, हमारे विश्वास, हमारी आस्था की कठिन परीक्षा लेते हैं।
इन्हीं चौदह दिनों में हमारे पास अवसर होता है स्वयं से जुड़ने का, अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाने का, अपनी आशा, अपनी आस्था को जगाए रखने का। ये वो चौदह दिन होते हैं जब हम परस्पर निर्भरता से मुक्त होकर सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर हो रहे होते है।
इस कठिन समय में हमें चाहिए की हम अपने भगवान और विज्ञान पर विश्वास रखते हुए अपने हौसले को डिगने ना दें। जयशंकर प्रसाद जी ने कभी कहा था-
“वह पथिक और पथिकता क्या जिसमें बिखरे कुछ शूल ना हों।
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या जब धाराएं प्रतिकूल ना हों॥”
