बरेली: कम लागत में किसानों को अच्छा मुनाफा दिला रही जैविक खेती

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। केंद्र व प्रदेश सरकार किसान को जैविक खेती से जोड़ने के लिए अभियान चला रही है। खासतौर से गंगा किनारे बसे गांवों को रासायनिक खेती के बजाय जैविक खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। ऐसे किसानों को बाजार भी शासन खुद मुहैया कराने की बात कह रहा है। इधर, जैविक …

बरेली, अमृत विचार। केंद्र व प्रदेश सरकार किसान को जैविक खेती से जोड़ने के लिए अभियान चला रही है। खासतौर से गंगा किनारे बसे गांवों को रासायनिक खेती के बजाय जैविक खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। ऐसे किसानों को बाजार भी शासन खुद मुहैया कराने की बात कह रहा है। इधर, जैविक विधि से खेती की तरफ जिले के किसानों का तेजी से रुझान बढ़ा है।

कृषि विभाग के अफसरों का कहना है कि प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का जो मंत्र दिया है उसमें खेती की लागत को कम करना भी शामिल है। इसको लेकर कृषि विभाग की तरफ से किसानों को लगातार जागरूक किया जा रहा है। पिछले साल गन्ने में रासायनिक खाद प्रयोग नहीं कर किसानों ने गन्ने की खेती और खुद ही गुड़ बनाया जो 80 से 100 रुपये किलो तक में बिक रहा है। जबकि रासायनिक खाद के इस्तेमाल से तैयार गुड़ 40 रुपये प्रति किलो है।

ऐसे में किसानों को न तो मिलों से गन्ना पर्ची का इंतजर करना पड़ा और पैसा भी नकद मिल गया। वहीं, गन्ने की बुवाई के बाद खेतों में जैविक विधि से गेहूं की बुवाई की गई। इसका उत्पादन थोड़ा कम हुआ, लेकिन लागत बहुत कम आई है। अफसरों का कहना है कि पिछले कुछ सालों से किसानों की आय में जैविक खेती की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। इसको लेकर समय-समय पर किसानों को प्रशिक्षण दिया जाता रहा है।

गोबर और गोमूत्र हैं खेती के लिए संजीवनी
कृषि विशेषज्ञ डा. हरीश गंगवार बताते हैं कि देशी गाय की नस्ल जैविक खेती के लिए वरदान है। देशी गाय के गोबर व मूत्र में बैक्टीरिया अधिक होते हैं। हमारी जमीन में बहुत से पोषक तत्व हैं, लेकिन उनको फसल तक पहुंचाने वाले बैक्टीरिया खत्म हो गए हैं। माना जाता है कि एक देशी गाय के  गोबर व मूत्र से एक हेक्टेयर जमीन में जैविक खेती की जा सकती है। देशी गाय के गोबर व मूत्र के प्रयोग से खेतों में पोषक तत्वों की कमी नहीं आएगी।

बढ़ाया जा रहा जैविक खेती का दायरा
किसान खेतों में यूरिया और डीएपी खाद डालते हैं। यूरिया की बोरी 266 रुपये और डीएपी की 1900 रुपये की आती है। कुछ किसान तो फसल के बीच में खपरतवार पैदा होने पर उसे खत्म करने के लिए भी कीटनाशकों का स्प्रे करते हैं। इससे लागत काफी बढ़ जाती है। जबकि, जैविक विधि में गोबर का खाद, गोमूत्र ही डाला जाता है। गंगा किनारे जैविक खेती का दायरा बढ़ाया जा रहा है।

क्या बोले लोग

नौवा नगला निवासी जितेंद्र ने बताया, गन्ना भुगतान की समस्या हर साल बनी रहती है। जैविक विधि से बड़े पैमाने पर तैयार गुड़ के गांव ही नहीं बाजार में काफी अच्छे दाम मिल रहे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि नकद भुगतान मिल रहा है और चीनी मिल पर निर्भरता कम हुई है। इस साल फसल हलकी रही। अगले साल और मेहनत करेंगे।

ग्रेम गांव के सर्वेश गंगवार ने बताया, मैं खेती में कोई रसायन खाद का प्रयोग नहीं करता हूं। गन्ने की फसल करके गुड़ बनाया था। कोई मसाला हमने गुड़ में नहीं लगाया। यह गुड़ बरेली के अलावा आसपास के जिले की मंडियों में बेचा गया। आमदनी सामान्य फसलों के बजाय डेढ़ गुना तक हो रही है।

गौशलपुर गांव के महेंद्रपाल ने बताया, अपने दो पांच-पांच बीघे के खेतों में एक ही प्रजाति के गेहूं बोए। एक खेत में जैविक विधि से खेती की तो दूसरे खेत में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया। रासायनिक उर्वरक वाले खेत में गेहूं चार से साढ़े चार क्विंटल प्रति बीघा जबकि जैविक विधि वाले खेत में छह क्विंटल प्रति बीघा की औसत से गेहूं निकला है।

हाफिजगंज के ज्ञान प्रकाश ने जैविक विधि से गेहूं की खेती की थी। खेतों में गोबर की खाद, देशी गाय का मूत्र व गोबर, लहसुन, गुड़ का घोल बनाकर उसे सड़ाकर स्प्रे किया। इससे फसल में कोई रोग नहीं लगा। गेहूं का सरकारी दाम 1975 रुपये प्रति क्विंटल है। जबकि जैविक तरीके से पैदा गेहूं ढाई से ढाई हजार रुपये प्रति क्विंटल रेट में बिका।

जैविक खेती अपना रहे लोग
जिला कृषि अधिकारी धीरेंद्र सिंह ने कहा कि जिले के तमाम किसान जागरूक हो चुके हैं। वह जैविक खेती अपना रहे हैं। गन्ने से लेकर पशुओं के चारे तक सभी फसल जैविक बोते हैं। उनसे प्रभावित होकर गांव के कई और किसान भी जैविक खेती अपना चुके हैं। जैविक खेती में लागत बहुत कम है। सारी खेती केवल प्राकृतिक संसाधनों से ही पूरी हो जाती है।

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