राजनीतिक संदेश के लिए उप्र में छिड़ी जनसंख्या नियंत्रण की मुहिम

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संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए योगी सरकार ने नई जनसंख्या नीति जारी की है। जबकि उत्तर प्रदेश विधि आयोग ने दो बच्चों का नियम लागू करने के लिए सख्त प्रावधानों वाला एक प्रस्ताव तैयार किया है। विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में इस तरह के कदम उठाए …

संजय सिंह, नई दिल्ली, अमृत विचार। उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए योगी सरकार ने नई जनसंख्या नीति जारी की है। जबकि उत्तर प्रदेश विधि आयोग ने दो बच्चों का नियम लागू करने के लिए सख्त प्रावधानों वाला एक प्रस्ताव तैयार किया है। विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में इस तरह के कदम उठाए जाने के राजनीतिक मायने हैं। जिसका मकसद विशिष्ट सोच वाले मतदाताओं को खास संदेश देना है। क्योंकि जनसंख्या के मामले में भले ही उत्तर प्रदेश का स्थान देश में अव्वल है। लेकिन यहां प्रति वर्ग किलोमीटर आबादी कई उन्नत राज्यों से अभी भी काफी कम है।

करीब 1.38 अरब की आबादी वाले भारत देश में 24 करोड़ लोगों के साथ उत्तर प्रदेश सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है। इसलिए प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में जनसंख्या नियंत्रण होना चाहिए। खासकर उन राज्यों में जहां जनसंख्या घनत्व और जनसंख्या वृद्धि दर दोनों अधिक हैं। लेकिन फिलहाल यूपी तथा एक-दो अन्य भाजपा शासित राज्यों को छोड़कर कहीं भी इसे लेकर सुगबुगाहट सुनाई नहीं देती।

इसीलिर उत्तर प्रदेश की ताजा मुहिम को चुनावी माना जा रहा है। क्योंकि जनसंख्या घनत्व अर्थात प्रति वर्ग किलोमीटर लोगों की संख्या के लिहाज से उत्तरप्रदेश की स्थिति कई राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से बेहतर है। उप्र में प्रति वर्ग किमी सिर्फ 996 लोग रहते हैं। जबकि यूपी से उन्नत स्थिति वाले दिल्ली प्रदेश में प्रति वर्ग किलोमीटर 12,803 लोगों की ही रिहायश है।

यही हाल चंडीगढ़, लक्षद्वीप, दादरा व नगर हवेली तथा दमन द्वीप का है। चंडीगढ़ में प्रति किलोमीटर 10,254 लोग रहते हैं। जबकि लक्षद्वीप में 2,317 लोग। यही नहीं, दादरा व नगर हवेली तथा दमन दीव में भी प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में रहने वालों की संख्या भी यूपी से ज्यादा यानी 1,028 है। इसके बावजूद इनमें से कोई भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश जनसंख्या नियंत्रण को लेकर यूपी जैसा व्यग्र नहीं दिखाई देता।

यूपी की नई जनसंख्या नीति के पीछे यदि ये तर्क है कि यहां जनसंख्या वृद्धि दर ज्यादा है, तो यह बात भी गले नहीं उतरती। क्योंकि इससे ज्यादा वृद्वि दर तो उसके पड़ोसी राज्य बिहार की है जहां जनसंख्या घनत्व और जनसंख्या वृद्धि दर दोनों यूपी से अधिक है।
उप्र का जनसंख्या घनत्व 996 तथा जनसंख्या वृद्धि दर 19.05 फीसद है। वहीं बिहार का जनसंख्या घनत्व 1349 और जनसंख्या वृद्धि दर 19.89 फीसद है। इसके बावजूद बिहार में अब तक जनसंख्या नियंत्रण की ऐसी कोई नीति नहीं आई है, जैसी उत्तर प्रदेश में अचानक ले आई गई है।

किसी प्रदेश की प्रगति वहां रहने वाले लोगों की संख्या या जनसंख्या घनत्व से नहीं, बल्कि उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और उत्पादकता आदि से तय होती है। उत्तर प्रदेश से अधिक जनसंख्या घनत्व के बावजूद दिल्ली का शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद अर्थात नेट स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (एनएसडीपी) 3,54,004 रुपये है। ऐसा शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा विकास जैसे मोर्चों पर दिल्ली के निरंतर बेहतर प्रदर्शन के कारण संभव हुआ है।

दिल्ली के मुकाबले उत्तर प्रदेश का एनएसडीपी केवल 65,431 रुपये है। बेहतर अवसरों के कारण ही यूपी के हजारों युवा हर साल दिल्ली कूच कर जाते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश को जनसंख्या नियंत्रण से ज्यादा स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योगों तथा बुनियादी सुविधाओं के विकास की जरूरत है। ताकि अधिकाधिक आबादी को रोजगार और संपत्ति के सृजन का अवसर मिल सके।

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