हल्द्वानी: परतदार चट्टानें होने के कारण हिमालयी क्षेत्रों में होता है भूस्खलन, पहले कभी यहां था महासागर…

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नरेन्द्र देव सिंह, हल्द्वानी। बारिश के दिनों में हिमालय क्षेत्रों में होने वाली भूस्खलन की घटनाएं आम हैं। इन घटनाओं की वजह से जान माल का भी नुकसान होता है। हिमालयी वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय की संरचना ऐसी है जिस वजह से यहां पर भूस्खलन की घटनाएं होती रहतीं हैं। अल्मोड़ा के कोसी …

नरेन्द्र देव सिंह, हल्द्वानी। बारिश के दिनों में हिमालय क्षेत्रों में होने वाली भूस्खलन की घटनाएं आम हैं। इन घटनाओं की वजह से जान माल का भी नुकसान होता है। हिमालयी वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय की संरचना ऐसी है जिस वजह से यहां पर भूस्खलन की घटनाएं होती रहतीं हैं।

अल्मोड़ा के कोसी कटारमल स्थित जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान में वैज्ञानिक डाॅ. जेसी कुनियाल ने बताया कि जहां इस समय हिमालय है, वहां पर कभी टेथिस सागर हुआ करता था। प्लेटों के आपस में टकराने के बाद हिमालय का निर्माण शुरू हुआ। वैसे तो यह बहुत पुरानी बात है, लेकिन अगर पृथ्वी की आयु देखें तो यह नवीन घटना है। माना जाता है कि हिमालय अभी भी अपनी निर्माण अवस्था है। अन्य पर्वतीय इलाकों की अपेक्षा हिमालय में परतदार चट्टानें होतीं हैं।

डॉ. जेसी कुनियाल

यह चट्टाने बारिश के दिनों में भरभरा के गिर जाती है। हम यह भी नहीं कह सकते कि मानवीय दबाव की वजह से ऐसा हो रहा है। जब हिमालय में मानवीय दबाव कम था तब भी यहां पर भूस्खलन होते रहते थे। यही नहीं आज के समय भी बुग्याल जैसे इलाकों में जहां मानवों की बस्ती नहीं हैं वहां भी भूस्खलन होते हैं।

पृथ्वी पर अन्य इलाकों में जहां पर्वतों की श्रंखला हैं वहां पर परतदार चट्टानें नहीं हैं। इसलिए हिमालय में भूस्खलन की घटनाएं ज्यादा होती हैं। बताया कि इसका बचाव केवल एक ही तरीके से हो सकता है। इसके लिए हिमालय क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा पेड़ों को लगाया जाए। क्योंकि पेड़ों की जड़ें चट्टानों को कसकर रखतीं हैं।

हिमालय को समझकर विकास के काम करने होंगे
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय की संरचना को देखते हुए यहां विकास के काम करने चाहिए। सड़कों, बांधों, भवनों के निर्माण से पहले उस स्थान की भौगोलिक संरचना का सही तरह से अध्ययन होना चाहिए। यह समझिए कि संरचना के हिसाब से हिमालय अभी शिशु अवस्था में है और इसका ख्याल भी वैसे ही रखना चाहिए।

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