नैनीताल: हरिद्वार में हुए पुस्तकालय घोटाले के मामले पर हाईकोर्ट ने नगर निगम हरिद्वार से मांगा जवाब
नैनीताल, अमृत विचार। हरिद्वार के बहुचर्चित पुस्तकालय घोटाले के मामले पर नैनीताल हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए नगर निगम हरिद्वार को अपना जवाब 2 सप्ताह के भीतर कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए हैं। बुधवार को सुनवाई के दौरान नगर निगम हरिद्वार के द्वारा याचिका का विरोध …
नैनीताल, अमृत विचार। हरिद्वार के बहुचर्चित पुस्तकालय घोटाले के मामले पर नैनीताल हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए नगर निगम हरिद्वार को अपना जवाब 2 सप्ताह के भीतर कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए हैं।
बुधवार को सुनवाई के दौरान नगर निगम हरिद्वार के द्वारा याचिका का विरोध किया गया और बताया कि पूर्व में भी घोटाले को लेकर एक जनहित याचिका दायर हुई थी, जिस का निपटारा हो चुका है। लिहाजा इस जनहित याचिका का कोई अस्तित्व नहीं, जिस पर याचिकाकर्ता के द्वारा कोर्ट को बताया गया कि तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत के द्वारा हरिद्वार में बनी सभी पुस्तकालयों को अपने अधीन लेने की बात कही थी लेकिन नवंबर 2019 से लेकर मार्च 2020 के मध्य तत्कालीन सीडीओ के द्वारा तीन पत्र जारी करे जिसमें सीडीओ के द्वारा पुस्तकालय को अपने अधीन ना होने की बात कही है। मामले को गंभीरता से सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान की खंडपीठ ने नगर निगम हरिद्वार को अपना विस्तृत जवाब 2 सप्ताह के भीतर कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए है।
आपको बताते चलें कि देहरादून निवासी याचिकाकर्ता सच्चिदानंद डबराल के द्वारा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा है कि 2010 में तत्कालीन विधायक मदन कौशिक के द्वारा विधायक निधि से करीब डेढ़ करोड़ की लागत से 16 पुस्तकालय बनाने के लिए पैसा आवंटित किया गया। पुस्तकालय बनाने के लिए भूमि पूजन से लेकर उद्घाटन और फाइनल पेमेंट पर हो गई, लेकिन आज तक धरातल पर किसी भी पुस्तकालय का निर्माण नहीं हुआ, जिससे स्पष्ट होता है कि विधायक निधि के नाम पर विधायक ने तत्कालीन जिला अधिकारी मुख्य विकास अधिकारी समेत ग्रामीण निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता के द्वारा बड़ा घोटाला किया गया है।
हाई कोर्ट पहुंचे याचिकाकर्ता का कहना है कि पुस्तकालय निर्माण का जिम्मा ग्रामीण अभियंत्रण सर्विसेस को दिया गया और विभाग के अधिशासी अभियंता के फाइनल निरीक्षण और सीडीओ की संस्तुति के बाद काम की फाइनल पेमेंट होती है तो ऐसे में विभाग के अधिशासी अभियंता और सीडीओ के द्वारा बिना पुस्तकालय निर्माण के ही अपनी फाइनल रिपोर्ट लगाकर पेमेंट कर दिया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि अधिकारियों की मिलीभगत से बड़ा घोटाला हुआ है। लिहाजा पुस्तकालय के नाम पर हुए इस घोटाले की सीबीआई जांच करवाई जाए।
