अब आगे क्या है?
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद हालात बेहद खराब हैं। भले ही तालिबान कहता रहे कि वह लोगों की रक्षा करेगा और किसी को परेशानी नहीं होने देगा लेकिन हजारों अफगानी वहां से पलायन करना चाहते हैं। पुरानी पीढ़ी तालिबान की अति रूढ़िवादी सोच को याद कर रही है। हालांकि तालिबान वर्ष 1990 के …
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद हालात बेहद खराब हैं। भले ही तालिबान कहता रहे कि वह लोगों की रक्षा करेगा और किसी को परेशानी नहीं होने देगा लेकिन हजारों अफगानी वहां से पलायन करना चाहते हैं। पुरानी पीढ़ी तालिबान की अति रूढ़िवादी सोच को याद कर रही है। हालांकि तालिबान वर्ष 1990 के क्रूर शासन के उलट खुद को अधिक लचीला दिखाने की कोशिश कर रहा है।
तालिबान ने काबुुल एयरपोर्ट पर लोगों के देश से पलायन की कोशिशों के बाद मची अफरातफरी के बाद मंगलवार को पूरे अफगानिस्तान में ‘आम माफी’ की एक बड़ी घोषणा की है और महिलाओं से उसकी सरकार में शामिल होने का आह्वान किया है। साथ ही तालिबान ने ‘खुली और समावेशी’’ इस्लामी सरकार बनाने और सत्ता का सुचारू हस्तांतरण सुनिश्चित करने की उम्मीद जताई है।
मौजूदा घटनाक्रम से अफगान आबादी की घबराई हुई प्रतिक्रिया को देखते हुए इस बात पर विश्वास करना मुश्किल होगा कि बहुत कुछ बदल गया है। फिर भी आशा की जानी चाहिए कि अफगानिस्तान में तालिबान अपनी प्रतिबद्धताओं को ईमानदारी से निभाएगा। हालांकि अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से वापसी की घोषणा के बाद से ही यह सवाल जस का तस है, पश्चिम एशिया में अब आगे क्या है?
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने की जल्दबाजी में की गई घोषणा के लिए आलोचना की जा रही है। वहीं राट्रपति जो कह रहे हैं कि अफगानिस्तान की यदि नई सरकार अपने देश के निवासियों के मूल अधिकारों की रक्षा करती है। आतंकवादियों को पनाह नहीं देती है और अपनी आधी आबादी यानी महिलाओं तथा लड़कियों के बुनियादी मौलिक अधिकारों सहित वहां के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करती है, तो हम उसके साथ काम कर पाएंगे।
इस मामले में चीन ने भी अमेरिका से अपने मनमुटाव दूर करने की कोशिश करते हुए कहा है कि अफगानिस्तान में गृहयुद्ध को रोकने और देश को फिर से आतंकवाद की पनाहगाह बनने से रोकने के लिए अमेरिका के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है। ताकि अफगानिस्तान में कोई नया गृहयुद्ध या मानवीय आपदा न हो तथा वह आतंकवाद के गढ़ और शरणस्थली में नहीं बदले। जबकि चीन तालिबान नेताओं को शह देता रहा है।
इसके विदेश मंत्री वांग यी ने पिछले महीने अफगान तालिबान के राजनीतिक प्रमुख मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के साथ एक बहुप्रचारित बैठक की। ऐसे में देखना होगा कि क्या तालिबान आतंकवाद के प्रायोजक के रूप में फिर से उभरेगा या अपने तौर-तरीकों को बदलेगा और इस तरह से व्यवहार करेगा कि वह अपने पड़ोसियों और इस क्षेत्र के लिए आम तौर पर खतरा न बन जाए?
