उठे सवाल
तालिबान ने अफगानिस्तान इस्लामिक अमीरात के गठन का ऐलान कर दिया है। एक ओर यूरोपीय संघ ने अफगानिस्तान के पतन और तालिबान के उभार को एक “बड़ी विपत्ति” तथा “दुःस्वप्न” करार दिया। दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी के प्रमुख ने कहा है कि तालिबान के कब्जे के बाद वहां एक मानवीय संकट उत्पन्न हो …
तालिबान ने अफगानिस्तान इस्लामिक अमीरात के गठन का ऐलान कर दिया है। एक ओर यूरोपीय संघ ने अफगानिस्तान के पतन और तालिबान के उभार को एक “बड़ी विपत्ति” तथा “दुःस्वप्न” करार दिया। दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी के प्रमुख ने कहा है कि तालिबान के कब्जे के बाद वहां एक मानवीय संकट उत्पन्न हो रहा है, जिसमें करीब डेढ़ करोड़ लोगों के सामने भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है।
दुनिया महसूस कर रही है कि युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में दो दशक से फंसे अमेरिका ने अपना पिंड छुड़ाने को तीन करोड़ अफगानियों को क्रूर तालिबानियों के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। सवाल पूछा जा रहा है कि दो दशकों में एक ट्रिलियन डॉलर खर्च करने और तीन लाख अफगान सैनिकों को प्रशिक्षित करने के दावे के बावजूद क्यों तालिबानियों को काबुल यूं आसानी से सौंप दिया।
ईयू के विदेश मामलों के प्रमुख जोसेप बोरेल ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने अफगानिस्तान में राष्ट्र निर्माण को महत्व नहीं दिया। राष्ट्रपति बाइडन कह चुके हैं अफगानिस्तान में राष्ट्र निर्माण उनका इरादा कभी नहीं था। हालांकि देश-दुनिया में हो रही आलोचनाओं का बचाव करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति अफगानिस्तान के तालिबान के कब्जे में आने के लिए अफगान सरकार व सेना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। फिर भी अफगानिस्तान के घटनाक्रम ने अमेरिका की नेतृत्वकारी भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
सवाल इस सारे प्रकरण में पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका को लेकर भी है, जिसको लेकर अमेरिका का रुख अनदेखी का ही रहा। भारत ने तालिबान को बढ़ावा देने में पाक की भूमिका के बाबत पिछले माह दिल्ली आए अमेरिकी विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकन को अवगत कराया था, लेकिन वे भारत की चिंताओं को दूर करने में विफल रहे। सही मायनों में अमेरिका को विश्व जनमत के सामने ईमानदारी से अपनी नाकामी स्वीकार करनी चाहिए। उधर अफगानिस्तान का जनमानस भय व असुरक्षा के बीच जी रहा है।
देश बीस साल पुरानी स्थिति में जा पहुंचा है। विश्व खाद्य कार्यक्रम की निदेशक मेरी एलेन मैकग्रार्टी ने कहा है अफगानिस्तान के घटनाक्रम ने, तीन वर्षो में देश के सबसे बुरे सूखे और कोविड-19 वैश्विक महामारी के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव से उत्पन्न विकट स्थिति को “तबाही” की ओर धकेल दिया है। तालिबान के आगे बढ़ने के साथ-साथ सैकड़ों-हजारों लोग विस्थापित हो गए हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब तालिबान ने शांति समझौते का पालन नहीं किया तो अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलने की जल्दबाजी क्या थी?
