अल्मोड़ा: शाही सल्तनत का गवाह बनेगा मल्ला महल 

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बृजेश तिवारी, अल्मोड़ा। अतीत की तरफ मुड़कर देखें तो अल्मोड़ा शहर अपने आप में एक इतिहास है और इसके साथ जुड़ी अतीत की इमारतें इसकी धरोहर। पत्थर और लकडिय़ों की बनी इमारतों में कई वर्षों का गुजरा कल बसता है। मल्ला महल भी एक ऐसी इमारत है। जिसने एक दौर में राजाओं की सल्तनत देखी। …

बृजेश तिवारी, अल्मोड़ा। अतीत की तरफ मुड़कर देखें तो अल्मोड़ा शहर अपने आप में एक इतिहास है और इसके साथ जुड़ी अतीत की इमारतें इसकी धरोहर। पत्थर और लकडिय़ों की बनी इमारतों में कई वर्षों का गुजरा कल बसता है। मल्ला महल भी एक ऐसी इमारत है। जिसने एक दौर में राजाओं की सल्तनत देखी। हुक्म देते हुए देखा और दरबार सजते भी हुए देखे। वर्तमान में इस महल में अल्मोड़ा का कलक्ट्रेट संचालित होता है। लेकिन यह महल अपनी पुरानी दास्तां को खुद बयां करे। इसके लिए अब इसे हैरिटेज के रूप में विकसित किया जा रहा है।
बात मल्ला महल की करें तो वक्त ने ज्यों ज्यों करवट बदली तो इसके साथ किस्से भी हजारों जुड़ते चले गए। 1915 में पहले जिलाधिकारी के तौर पर ई डब्ल्यू गार्डनर ने यहां कलक्टर की कुर्सी संभाली थी। मगर बात इससे पहले की करें तो राजशाही सल्तनत मल्ला महल ने देखी है। अल्मोड़ा के इतिहास पर नजर डालें तो यह कस्बा स्थापना से पूर्व कत्यूरी राजा बैचलदेव के अधीन था। कत्यूरी शासन के दौरान इस शहर को राजपुर नाम से जाना जाता था।
17 वीं शताब्दी में चंद राजाओं ने अल्मोड़ा पर अपना कब्जा जमा लिया और तत्कालीन राजा रूद्र चंद ने अल्मोड़ा के मध्य में मल्ला महल का निर्माण कराया। वर्ष 1731 में नेपाल के गोरखाओं ने काली नदी के पश्चिम से अपने राच्य का विस्तार किया और अल्मोड़ा पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया। बाद में अंग्रेजों ने भारत पर आक्रमण किया और गोरखाओं को परास्त कर अल्मोड़ा को अपने अधीन कर लिया। इस तरह अल्मोड़ा के मल्ला महल ने अतीत से लेकर अब तक अनेक उतार चढ़ाव देखे। यह महल आज भी पुरानी यादों को सहेजे हुए है और इस शहर की यह सबसे प्राचीन धरोहरों में एक भी है। अल्मोड़ा की बसासत के इतिहास की बात करें तो यह चंद और कत्यूरी राजाओं से जुड़ा हुआ है। कत्यूरी शासकों का यहां वर्ष 1560 तक प्रवास रहा। मगर इस शहर ने असल आकार 1563 में चंद राजाओं के शासन से लेना शुरू किया। यह शहर चंद राजाओं की राजधानी भी बना।
नागर शैली में किया गया है निर्माण 
अल्मोड़ा का मल्ला महल यानी वर्तमान कलक्ट्रेट भवन नागर शैली में निर्मित है। इसका निर्माण स्थानीय प्रस्तरों से किया गया है। ढलाननुमा और टिन से बनी छत इसकी पौराणिकता की कहानी को बयां करती है। अल्मोड़ा के मल्ला महल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण के लिए नगर के मध्य का सबसे ऊंचा स्थान चयनित किया गया। यहां से पूरे नगर पर आसानी से नजर पड़ती है।
रामशिला मंदिर का भी कराया निर्माण 
चंद वंशीय राजा रूद्र चंद्र द्वारा 1588 में अष्ट पहल दुर्ग में रामशिला मंदिर का निर्माण कराया था। यह उत्तर मध्यकालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इस मंदिर के केंद्रीय कक्ष में विस्तृत प्रस्तर पर युगल चरण चिन्ह अंकित हैं। जिन्हें भगवान राम चंद्र के चरणों की मान्यता है। इसके पश्चिमी कक्ष में राजा बाज बहादुर चंद द्वारा 1671 में गढ़वाल के जूनियागढ़ किले से विजय के उपरांत लाई गई मां नंदा देवी की मूर्ति स्थापित की गई। वर्ष 1815 से 35 के मध्य ब्रिटिश कमिश्नर जी डब्ल्यू ट्रेल ने नंदा देवी और काल भैरव के विग्रहों को दुर्ग से बाहर मल्ला महल में स्थानांतरित किया।
अब गुजरे वक्त का गवाह बनेगा मल्ला महल
वर्तमान में मल्ला महल में कलक्ट्रेट का संचालन किया जा रहा है। लेकिन मल्ला के इतिहास को देखते हुए इसे हैरिटेज के रूप में विकसित करने का कार्य शुरू हो गया है। कलक्ट्रेट को विकास भवन के पास बन रहे नए भवन में स्थानांतरित किया जाएगा। मल्ला महल के मूल रूप को संरक्षित करते हुए यहां उन सभी शासकों से जुड़ी यादों से जोड़ा जाएगा। उनके द्वारा प्रयोग में लाई गई सामग्री का संकलन कर उसे यहां विरासत के रूप में सहेजा जाएगा। रानी महल में फोटो गैलरी के अलावा ओपन एअर थिएटर, सोलह संस्कार, नंदादेवी स्टोरी व अर्बन कल्चर से जुड़ी सामग्री भी यहां सैलानियों को आकर्षित करने का प्रयास करेगी। कुल मिलाकर अब इस मल्ला महल में यहां से सल्तनत कर चुके प्रत्येक राजाओं और उनके वंशजों से जुड़ी जानकारी सैलानियों को इस महल में आकर मिल सकेगी।

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