गंभीर चुनौती
अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी ने मानवता के लिए संकट खड़ा कर दिया है। वहां पूरे देश में अराजकता का माहौल है। प्रशासन के नाम पर हथियारों से लैस तालिबानियों का कब्जा है। सत्ता पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने कई घोषणाएं कर अपना उदारवादी चेहरा दिखाने की कोशिश की, लेकिन कई …
अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी ने मानवता के लिए संकट खड़ा कर दिया है। वहां पूरे देश में अराजकता का माहौल है। प्रशासन के नाम पर हथियारों से लैस तालिबानियों का कब्जा है। सत्ता पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने कई घोषणाएं कर अपना उदारवादी चेहरा दिखाने की कोशिश की, लेकिन कई इलाकों में ज्यादती बढ़ रही है। वहां के घटनाक्रम के बाद विश्व पटल पर तीन देशों के नए गठबंधन का उदय हुआ है, जिसमें चीन, रूस और पाकिस्तान शामिल हैं।
ईरान के संबंध भी अमेरिका के साथ ठीक नहीं हैं, इसलिए वह भी अफगानिस्तान के मामले में इन तीन देशों के साथ है और तालिबान को मान्यता देने के पक्ष में ही नज़र आ रहा है। वहां अफरा-तफरी है और लोग पलायन कर रहे हैं। शरणार्थी समस्या बढ़ रही है, जिसका सीधा असर भारत समेत अफगानिस्तान के कई पड़ोसी देशों पर दिख रहा है। तालिबानी शासन व्यवस्था में किस तरह के संबंध अफगानिस्तान के साथ रखे जाएं- इस सवाल पर दुनिया भर के राजनयिक मंथन में जुटे हैं। चीन, पाकिस्तान, रूस और ईरान- ये चार देश अभी तालिबान के पक्ष में दिख रहे हैं। और इस कट्टरपंथी संगठन के शासन को मान्यता देने की वकालत कर रहे हैं।
भारत के सामने अहम सवाल है कि वह तालिबान शासन के साथ कैसे संबंध रखे। अफगानिस्तान में 20 साल में भारत ने 500 छोटी-बड़ी योजनाओं पर पैसा खर्च किया है। स्कूल, अस्पताल, बच्चों के हॉस्टल, पुल और संसद भवन तक बनवाए हैं। भारत इस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की दो बैठकों की अध्यक्षता कर चुका है। भारत ने अफगानिस्तान के हालात पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जो चिंताएं रखीं, उनका सरोकार सभी देशों से है।
भारत ने साफ कहा है कि अफगानिस्तान के हालात न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी गंभीर चुनौती बन गए हैं। अफगानिस्तान के हालात बता रहे हैं कि आतंकवाद से निपटने में अगर वैश्विक समुदाय ने इच्छाशक्ति नहीं दिखाई तो भविष्य में हालात और बदतर होते चले जाएंगे। दूसरे और देश भी आतंकवाद की जद में आते जाएंगे। बतौर सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भारत ने जो उपाय सुझाए हैं, वे महत्वपूर्ण हैं।
यह तो पूरी दुनिया जान रही है कि दूसरे देशों की तरह भारत भी लंबे समय से सीमापार आतंकवाद की मार झेल रहा है। फिलहाल भारत ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं और भारत को अपने अनुभवों से सीखना चाहिए और 1990 के दशक की अपनी गलतियों को दोहराने से बचना चाहिए और अभी जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए।
