अमेरिका की वापसी
अमेरिका ने आखिरकार 31 अगस्त के तय समय से पहले ही अफगानिस्तान में अपने सैन्य अभियान को खत्म कर दिया। सोमवार की रात अंतिम अमेरिकी सैनिक ने काबुल एयरपोर्ट से उड़ान भर ली। इसके साथ ही अफगानिस्तान के लाखों लोगों की जिंदगी तालिबान के हवाले हो गई और 20 साल में अफगानियों को आजादी और …
अमेरिका ने आखिरकार 31 अगस्त के तय समय से पहले ही अफगानिस्तान में अपने सैन्य अभियान को खत्म कर दिया। सोमवार की रात अंतिम अमेरिकी सैनिक ने काबुल एयरपोर्ट से उड़ान भर ली। इसके साथ ही अफगानिस्तान के लाखों लोगों की जिंदगी तालिबान के हवाले हो गई और 20 साल में अफगानियों को आजादी और बेखौफ जीने का जो जज्बा मिला, उसका भी अंत हो गया है। आने वाला समय आम अफगानियों के लिए और ज्यादा स्याह हो जाने की आशंका है।
अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ 2001 में अभियान शुरू किया था। अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने तालिबान के विरोधी नॉर्दर्न अलायंस मिलिशिया के साथ मिलकर नवंबर के दूसरे सप्ताह में काबुल, कंधार व कई अन्य इलाके तालिबान से छुड़ा लिए। हामिद करजई की अगुवाई में नई सरकार बनी। 2004 में अफगानिस्तान का संविधान तैयार हुआ, लेकिन धीरे-धीरे तालिबान ने आत्मघाती हमले शुरू कर दिए। ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2010 तक अफगानिस्तान में कुल एक लाख सैनिक भेज दिए।
तालिबान और अमेरिकी सैनिकों के बीच तेज जंग छिड़ गई। इधर अमेरिका के सैनिकों ने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया। इसके बाद अमेरिका ने 2013 में अफगानों को आंतरिक सुरक्षा सौंप दी। हालांकि अमेरिकी फौजें वहां व्यवस्था पटरी पर आने तक मौजूद रहीं 2018 में अमेरिका और तालिबान में शांति-वार्ता शुरू हुई। इस वार्ता में अफगानिस्तान की सरकार शामिल नहीं थी। 29 फरवरी 2020 को कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका ने फौज वापसी के लिए तालिबान से समझौता कर लिया।
अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन ने अफगानिस्तान से अमेरिका की पूरी वापसी की घोषणा कर दी। इस ऐलान के कुछ दिनों बाद ही तालिबान पूरी तरह से मैदान में आ गया। अमेरिकी सेना सिर्फ काबुल एयरपोर्ट तक रह गई। ऐसे में तालिबान ने दो महीने के अंदर देश के करीब-करीब सभी प्रांतों को अपने कब्जे में ले लिया। उम्मीद के विपरीत अफगानी सेना ने बिना लड़े ही हथियार डाल दिए। अब जब अफगानिस्तान में तालिबान की दूसरी पारी शुरू हो चुकी है। अफगानी नागरिकों को तालिबानी शासन की पहली पारी याद आने लगी है। वे चिंतित हैं। अफगानिस्तान का भविष्य क्या होगा और वहां की तालिबानी सरकार में लोग कैसे जिंदगी गुजारेंगे इसको लेकर तमाम तरह की आशंकाएं हैं।
