अफगानिस्तान में चुनौतियां

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Edited By Amrit Vichar
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अफगानिस्तान में नई सरकार बनाने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के उप-प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकज़ई का कहना है कि अफगानिस्तान में ‘इस्लामिक अमीरात’ वाली नई सरकार का खाका अगले एक-दो दिन में दुनिया के सामने होगा। नई सरकार की शक्ल क्या होगी, इससे बड़ा सवाल है कि तालिबान की …

अफगानिस्तान में नई सरकार बनाने की कोशिशें तेज़ हो गई हैं। तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के उप-प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकज़ई का कहना है कि अफगानिस्तान में ‘इस्लामिक अमीरात’ वाली नई सरकार का खाका अगले एक-दो दिन में दुनिया के सामने होगा। नई सरकार की शक्ल क्या होगी, इससे बड़ा सवाल है कि तालिबान की नई सरकार चुनौतियों से कैसे निपटेगी।

फिलहाल अफगनिस्तान में सियासी और सामाजिक माहौल काफी उथल-पुथल भरा है। कोई ठोस शासन व्यवस्था वहां बहाल नहीं है। हालात भगदड़ जैसे हैं। लोग अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंतित हैं। जीवन यापन मुश्किल हो रहा है। किसी भी सरकार के लिए ऐसे हालात चिंताजनक होने चाहिए।

लोगों में विश्वास बहाली के लिए तालिबाननीत नई सरकार को बाहरी उपायों से ज्यादा खुद में बदलाव करना होगा। देश को स्थाई सरकार देने और लोगों में भरोसा पैदा करने के लिए सबसे पहले अंदरूनी गुटबाजी से निपटना होगा। खासकर गरम धड़े को जिम्मेदारी का बर्ताव करना होगा। हालांकि कई धड़ों में बंटे तालिबान के लिए यह कतई सरल नहीं होगा। नॉर्दन एलायंस जैसे विरोधी गुटों से निपटना भी चुनौती होगी।

तालिबान सरकार के सामने प्रशासनिक अनुभव भी आड़े आएगा। 1996 से 2001 के बीच तालिबान ने बंदूक के दम पर शासन किया था। वह कोई आदर्श शासन नहीं था। आज की परिस्थिति उस समय से एकदम भिन्न है। सरकार में सियासी जानकार, ब्यूरोक्रेट्स, समझौतावादी प्रशासन चलाने के अनुभवी लोगों की जरूरत होती है।

तालिबान सरकार ऐसे लोगों को जुटा सकेगी इसमें संशय है। नई सरकार को विश्वव्यापी मान्यता की भी दरकार रहेगी। सिर्फ चीन, रूस, पाकिस्तान जैसे देशों के समर्थन से काम नहीं चलने वाला। देश चलाने के लिए फॉरेन फंडिंग भी चाहिए होगी। वहां आर्थिक गतिविधियां फिलहाल बंद पड़ी हैं। बहरहाल ज्यादातर देश उनकी सरकार के पहले रूप का इंतज़ार कर रहे हैं। नई सरकार को सबसे पहले अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए साहसिक क़दम उठाने होंगे ताकि लोगों की रोजी-रोटी की व्यवस्था हो सके।

अफगानिस्तान में बेहतरीन सुरक्षाबलों की भी भारी कमी है। नई सरकार के सामने अनुशासित और ताक़तवर फोर्स और पुलिस तैयार करने की भी चुनौती होगी। बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के बीच एकता बनाए रखना भी बेहद जरूरी होगा। 1996 से 2001 के बीच तालिबान ने अल्पसंख्यकों को बहुत ज्यादा परेशान किया था। जैसे भी हो अफगानिस्तान में शांति और व्यवस्था बेहद जरूरी है।