नई आफत
उत्तर प्रदेश में रहस्यमयी बुखार ने सैकड़ों मासूमों की जान ले ली है। लोगों में बीमारी का खौफ लगातार बढ़ता जा रहा है। शुरूआत में इस बुखार का प्रकोप तीन जिलों में ही देखा गया था लेकिन अब प्रदेश के 20 से अधिक जिलों तक फैल चुका है और प्रत्येक जिले में प्रतिदिन औसतन पांच …
उत्तर प्रदेश में रहस्यमयी बुखार ने सैकड़ों मासूमों की जान ले ली है। लोगों में बीमारी का खौफ लगातार बढ़ता जा रहा है। शुरूआत में इस बुखार का प्रकोप तीन जिलों में ही देखा गया था लेकिन अब प्रदेश के 20 से अधिक जिलों तक फैल चुका है और प्रत्येक जिले में प्रतिदिन औसतन पांच सौ नए मरीज मिल रहे हैं, जिनमें बच्चों की संख्या सर्वाधिक है। इसका प्रकोप धीरे-धीरे अब गांवों की ओर बढ़ता जा रहा है। कुछ इस रहस्यमयी बुखार को ‘इंफ्लुएंजा’ वायरस मान रहे हैं तो कुछ डेंगू और कुछ अन्य इसे इंफ्लुएंजा वायरस के स्वरूप में बदलाव की आशंका के तौर पर भी देख रहे हैं।
फिरोजाबाद जिले में 50 से ज्यादा बच्चों की मौत होने के बाद मचे हड़कंप के पश्चात केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से स्थिति का जायजा लेने के लिए एक टीम वहां भेजी गई थी। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केन्द्र (एनसीडीसी) और राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीसीडीपी) के पांच विशेषज्ञों के इस दल ने फिरोजाबाद तथा आसपास से करीब 200 सैंपल लिए, जिनमें 100 से ज्यादा नमूनों में डेंगू की पुष्टि हुई जबकि कई नमूनों में स्क्रब टाइफस के मामले भी मिले।
विशेषज्ञ दल का कहना है कि जब तक एकत्रित किए गए नमूनों की पूरी जांच नहीं हो जाती, तब तक बीमारी के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। कोरोना की दूसरी लहर में प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था लड़खड़ा गई थी। इस बार यही स्थिति अधिक देखी जा रही है। प्रभावित जिलों के अस्पतालों में भारी भीड़ है। अधिकांश जगहों पर अस्पतालों में जांच के लिए लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। अस्पतालों में रोगियों के परिवार के सदस्यों को स्वास्थ्य अपडेट दिया जाए तो ओपीडी में होने वाली अनावश्यक भीड़ से बचा जा सकता है।
यूपी जैसे बड़े राज्य में जब ऐसी बीमारियां फैलती हैं, तो उन पर काबू पाना एकदम से कठिन हो जाता है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में उपचार की समुचित सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए ज्यादातर लोग पहले परंपरागत तरीके से इलाज की कोशिश करते हैं। फिर जब मामला बिगड़ने लगता है, तो मरीज को ब्लॉक या छोटे कस्बों के अस्पतालों में ले जाते हैं। वहां जांच आदि की जरूरी सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण जिला अस्पताल या किसी बड़े अस्पताल में ले जाने को कहा जाता है।
तब तक कई मरीज समय पर इलाज न मिल पाने के कारण दम तोड़ देते हैं। जरूरी है कि इस बात के पुख्ता प्रबंध किए जाएं कि अस्पतालों में ऐसे लोगों के इलाज में किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरती जाए। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की ओर सरकार को ध्यान देना होगा। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं।
