चुनाव पर नजर
अगले वर्ष उत्तरप्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं। तमाम राजनैतिक दल अपने वोट बैंक को संभालने में जुट गए हैं। प्रदेश में कहा जाता है, जिसके जाट, उसके ठाठ और भाजपा जाटों को लुभाने में लगी है। जाट और किसान परस्पर पर्यायवाची ही हैं। हालांकि उप्र में उनकी 6-8 फीसदी आबादी है, लेकिन पश्चिम …
अगले वर्ष उत्तरप्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं। तमाम राजनैतिक दल अपने वोट बैंक को संभालने में जुट गए हैं। प्रदेश में कहा जाता है, जिसके जाट, उसके ठाठ और भाजपा जाटों को लुभाने में लगी है। जाट और किसान परस्पर पर्यायवाची ही हैं। हालांकि उप्र में उनकी 6-8 फीसदी आबादी है, लेकिन पश्चिम उप्र में वह 17 फीसदी से ज्यादा हैं। उसका असर 18 लोकसभा सीटों और 50 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर है। 2019 के आम चुनाव में करीब 91 फीसदी जाटों ने भाजपा को वोट दिया था। अब किसान आंदोलन और अन्य मुद्दों के कारण भाजपा के चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं।
पार्टी किसी भी तरह अपने जाट वोट बैंक को गंवाना नहीं चाहती है, लिहाजा पार्टी को राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम का बड़ा भरोसा है। चौ. देवीलाल की जयंती पर 25 सितंबर को जींद (हरियाणा) में जो जमावड़ा किया जा रहा है, भाजपा की आंख उस पर भी है। भाजपा के लिए इस बार मुश्किल चुनौतियां हैं। पिछले नौ माह से किसानों का जो आंदोलन चल रहा है, वह आगे ही बढ़ता जा रहा है। इस कारण भी भाजपा की चिंताएं बढ़ जाना स्वाभाविक है। ऐसे में पार्टी के लिए यह हितकारी होगा कि किसानों की समस्याएं सुलझा ली जाएं।
मंगलवार को प्रधानमंत्री ने एक बार फिर किसान की आमदनी दोगुनी करने की घोषणा की। यही सबसे अहं, छद्म यथार्थ है, क्योंकि किसान की आय बढ़ने की बजाय करीब 38 फीसदी घट गई है और उस पर औसतन कर्ज 57 फीसदी बढ़ा है। यह केंद्र के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के सर्वे की ताजा रिपोर्ट का निष्कर्ष है। रिपोर्ट किसान, खेती, उनकी गरीबी, मज़दूरी आदि से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण पहलुओं के खुलासे करती है।
रपट के मुताबिक, 2018-19 में, मोदी सरकार के ही दौरान, किसान की औसतन आय 8337 रुपए थी। उसमें से 4063 रुपए किसान मज़दूरी आदि से कमाता था, जबकि खेती, उपज से सिर्फ 3058 रुपए की ही आमदनी हो पाती थी। कुछ आमदनी पशुपालन बगैरह से भी होती थी, लेकिन ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ समान ही। वर्ष 2013 की तुलना में किसान की आमदनी करीब 38 फीसदी घटी है, लिहाजा महत्वपूर्ण सवाल है कि 2022 तो क्या, चुनावी वर्ष 2024 तक भी किसान की आय दोगुनी कैसे होगी?
हालांकि किसान आंदोलन भी एक राजनीतिक एजेंडा है और वह छोटे, सीमांत किसान को और भी कमज़ोर करेगा। इसलिए सरकार को राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन करके उसे संवैधानिक दर्जा देना चाहिए। प्रावधान रखा जाए कि आयोग की रपट सरकार पर बाध्यकारी होगी। संभव है कि कुछ बेहतर परिणाम सामने आएं और किसानों का संकट कम होने लगे।
