मजबूत राष्ट्रीय रुख
अफगानिस्तान के मुद्दे पर सरकार ने सभी विपक्षी दलों को भरोसे में लेकर ‘देखो और प्रतिक्षा करो की नीति’ पर चलने का ऐलान किया है। गुरूवार को विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने एक बैठक में विपक्षी दलों के संसदीय नेताओं को अफगानिस्तान की स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। सरकार की ओर से …
अफगानिस्तान के मुद्दे पर सरकार ने सभी विपक्षी दलों को भरोसे में लेकर ‘देखो और प्रतिक्षा करो की नीति’ पर चलने का ऐलान किया है। गुरूवार को विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने एक बैठक में विपक्षी दलों के संसदीय नेताओं को अफगानिस्तान की स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। सरकार की ओर से कहा गया कि यह पूरे देश की समस्या है। लोगों और राष्ट्र के हितों के लिए मिलकर काम करना होगा। अफगानिस्ताुन में सत्ता परिवर्तन के बाद हालात खराब हैं। काबुल की स्थिति डांवाडोल है। हमें अभी धैर्य रखना होगा।
बैठक में पूरे विपक्ष ने सरकार की इस नीति का समर्थन किया है। सरकार की ओर से विपक्षी नेताओं के हर सवाल का जवाब दिया गया। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद देश में विपक्षी दल लगातार मांग कर रहे थे कि केंद्र सरकार इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करे। रणनीतिक तौर सरकार ने इस मामले पर चुप्पी साध रखी थी। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, तो तालिबान को लेकर केंद्र सरकार की चुप्पी को विपक्ष ‘घुटने टेकने’ की तरह पेश कर रहा था। जबकि विपक्ष की ओर से भी तालिबान को लेकर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। इस मामले में सरकार व विपक्ष के बीच संवाद की खिड़की का खुलना देश के लिए सुखद है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर हुई बैठक में सरकार ने दोहराया कि उसकी पहली प्राथमिकता सभी भारतीयों को अफगानिस्तान से वापस लाना है। बैठक से संदेश मिला है कि अफगानिस्तान के बारे में सभी दलों के विचार समान हैं यानि हम साथ साथ हैं। हमारा मजबूत राष्ट्रीय रूख है और अफगानिस्तान के लोगों के साथ मित्रता हमारे लिए महत्वपूर्ण है। भारत को अफगानिस्तान के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रही गतिविधियों तथा निर्णयों पर भी नजर रखनी होगी। हालांकि भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ निरंतर बातचीत कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल और रूस के राष्ट्रपति पुतिन से बात हो चुकी है। हालांकि बदलते हालात के बीच भारत के रुख में नरमी जरूर है, परंतु अफगानिस्ताान की सत्ता पर फिर से काबिज तालिबान के साथ भारत के कैसे संबंध होंगे, इस पर सरकार की ओर से अभी कुछ साफ नहीं किया गया है।
वैसे भारत ने सभी विकल्प खुले रखने के संकेत दिए हैं। जानकारों के अनुसार अगर तालिबान के साथ सीधे-सीधे बातचीत नहीं होती तो बैकडोर डिप्लोमेसी का रास्ता खुला हुआ है। अफगानिस्तान में सब कुछ जितनी तेजी से हुआ वह चौंकाने वाला है। लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद अफगानिस्तान में अपना ठिकाना बना चुके हैं। आशंका है कि वहां की धरती का इस्तेमाल कर वे भारत पर आतंकी हमले कर सकते हैं। हमें ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए भी आपातकालीन योजनाएं बनानी होंगी।
