भरोसे का संकट

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Edited By Amrit Vichar
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व्यापक सुधारों के अभाव में संयुक्त राष्ट्र पर ‘भरोसे की कमी का संकट’ मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर आज कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत पर बल देता रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र अपने सुधार के लिए कोई प्रयास करता दिख नहीं …

व्यापक सुधारों के अभाव में संयुक्त राष्ट्र पर ‘भरोसे की कमी का संकट’ मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर आज कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत पर बल देता रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र अपने सुधार के लिए कोई प्रयास करता दिख नहीं रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से उसकी संरचना में सुधार की बात रखकर दुनिया का ध्यान इस ओर दिलाया है।

उन्होंने बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया, जो मौजूदा वास्तविकताओं को दर्शाए, सभी पक्षकारों की बात रखे, समकालीन चुनौतियों का समाधान दे और मानव कल्याण पर केंद्रित हो। आज परस्पर जुड़े हुए विश्व में, बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। चाणक्य ने कहा है, जब सही समय पर सही कार्य नहीं किया जाता, तो समय ही उस कार्य की सफलता को समाप्त कर देता है। प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो भाषण दिया उसमें इस बात पर जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र को खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उसे अपनी प्रभावशीलता को सुधारना होगा, विश्वसनीयता को बढ़ाना होगा।

प्रधानमत्री ने क्षतिग्रस्त विश्वसनीयता के लिए जिन मौजूदा संस्थानों का उल्लेख किया उनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन अभी भी विवादों में है, क्योंकि वह कोरोना महामारी के शुरुआती दौर में उसका सही ढंग से प्रबंधन नहीं कर सका और कोविड-19 के स्रोत की पड़ताल नहीं कर सका। विश्व बैंक की विश्वसनीयता को तब धक्का पहुंचा जब हाल ही में एक आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया कि अतीत में उसकी कारोबारी सुगमता रैकिंग में अनियमितता देखी गई हैं।

जलवायु संकट, कोविड-19 की निष्पक्ष जांच, अफगानिस्तान संकट, दुनिया के कई हिस्सों में छद्म युद्ध, आतंकवाद के खिलाफ जंग, वैश्विक ताकतों द्वारा कमजोर देशों की संप्रभुता का अतिक्रमण आदि ऐसे अनेक मुद्दे हैं, जिन पर संयुक्त राष्ट्र मूकदर्शक साबित हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में जब इसकी स्थापना हुई थी, उस वक्त विश्व की जो स्थिति थी, आज पूरी तरह बदल चुकी है।

ऐसे में संयुक्त राष्ट्र को भी आज की वैश्विक जरूरत के अनुरूप बनाया जाना जरूरी है। सबसे बड़ा बदलाव संयुक्त राष्ट्र के वीटो नियमों में होना जरूरी है। 193 सदस्यों वाले यूएन में केवल पांच स्थायी सदस्य का होना न्याय नहीं है। अब जबकि संयुक्त राष्ट्र ने अपना 75 वर्ष का सफर पूरा कर लिया है, ऐसे में उसके चार्टर की पुनर्संरचना होनी जरूरी है।