प्रदर्शन पर सवाल
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों के विरोध प्रदर्शन पर कहा कि जब तीनों कानूनों पर रोक लगा दी गई है, तो किसान संगठन किसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि कानूनों की वैधता को न्यायालय में चुनौती …
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों के विरोध प्रदर्शन पर कहा कि जब तीनों कानूनों पर रोक लगा दी गई है, तो किसान संगठन किसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि कानूनों की वैधता को न्यायालय में चुनौती देने के बाद ऐसे विरोध प्रदर्शन करने का सवाल ही कहां उठता है। किसान आंदोलन के कारण दिल्ली की सीमाएं बंद होने और लोगों को रोजाना होने वाली परेशानियों को लेकर उच्चतम न्यायालय की नाराजगी स्वाभाविक है। क्योंकि लंबा समय गुजर जाने के बाद भी समस्या का कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा।
कृषि कानूनों की तरह ही उनके खिलाफ आंदोलन भी एक साल पुराना है। जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी और अमल के लिए आगे का रास्ता सुझाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति नियुक्त की थी। नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों और केंद्र सरकार के बीच बढ़ता गतिरोध दरअसल दोनों पक्षों की हठधर्मिता का नतीजा है।
ग्यारह दौर की वार्ता के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया। आंदोलनकारी किसानों के मामले में सरकार का रवैया भी चिंताजनक है। लगता है कि सरकार यह मान कर बैठ गई है कि किसान परेशान होकर एक न एक दिन अपने आप लौट जाएंगे। किसान भी इस जिद पर अड़ गए हैं कि जब तक सरकार इन कृषि कानूनों को वापस नहीं लेती, तब तक आंदोलन खत्म नहीं करेंगे। दो दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि कानूनों के हो रहे विरोध को राजनीतिक धोखाधड़ी करार देते हुए कहा कि कुछ लोग केवल विरोध के लिए विरोध करते हैं।
अब शीर्ष अदालत ने एक याचिका पर किसान संगठनों के 42 नेताओं को नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने बातचीत में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने रविवार की लखीमपुर खीरी घटना का जिक्र किया, जिसमें आठ लोग मारे गए थे। इस पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसी घटना होने पर कोई इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता। किसानों के साथ ही सरकारों के रुख को लेकर भी अदालत कम नाराज नहीं है।
इसलिए किसान संगठन सकारात्मक रूप से सोचे कि प्रदर्शन का अधिकार किसानों को है, तो आराम से जिंदगी जीने, काम करने और आवाजाही का अधिकार आम नागरिक को भी है। सरकार को भी किसानों के विश्वास और भरोसे को जीतने के उपाय करने की जरूरत है। क्योंकि जैसे-जैसे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे, किसान आंदोलन एक महत्वपूर्ण और भावनात्मक चुनावी मुद्दा होता जाएगा।
