अहोई अष्टमी व्रत से मां पार्वती देंगी ये वरदान, जानें कथा और पूजन-विधि
अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद रखा जाता है। यह व्रत करवा चौथ के समान ही रखते हैं इस व्रत में भी महिलाएं पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं करती हैं। इस व्रत का पारण तारों को देखने के बाद किया जाता है। हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत संतान …
अहोई अष्टमी का व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद रखा जाता है। यह व्रत करवा चौथ के समान ही रखते हैं इस व्रत में भी महिलाएं पूरे दिन जल तक ग्रहण नहीं करती हैं। इस व्रत का पारण तारों को देखने के बाद किया जाता है। हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत संतान की भलाई के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि अहोई अष्टमी के दिन व्रत कर विधि-विधान से अहोई माता की पूजा करने से मां पार्वती अपने पुत्रों की तरह ही आपके बच्चों की रक्षा करती हैं, साथ ही यह व्रत शादी के बाद नई दुल्हन संतान प्राप्ति के लिए भी रख सकती हैं।
अहोई अष्टमी व्रत की पूजन विधि
माताएं सूर्योदय से पूर्व स्नान करके व्रत रखने का संकल्प लें। अहोई माता की पूजा के लिए दीवार या कागज पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाएं और साथ ही सेह और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं। शाम के समय पूजन के लिए अहोई माता के चित्र के सामने एक चौकी रखकर उस पर जल से भरा कलश रखें। इस दिन कथा सुनते समय 7 प्रकार के अनाज अपने हाथों में जरूर रखें( पूजा के बाद यह अनाज किसी गाय को खिला दें। रोली-चावल से माता की पूजा करें। अहोई माता को दूध चावल, मीठे पुए या आटे के हलवे का भोग लगाएं। कलश पर स्वास्तिक बना लें और हाथ में गेंहू के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा सुनें। इसके उपरान्त तारों को अर्घ्य देकर अपने से बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। फिर बच्चों को अपने हाथों से दूध चावल खिलाएं।
अहोई अष्टमी व्रत कथा
अहोई अष्टमी कथा के अनुसार एक शहर में एक साहूकार के 7 लड़के रहते थे। साहूकार की पत्नी दिवाली पर घर लीपने के लिए अष्टमी के दिन मिट्टी लेने गई। जैसे ही मिट्टी खोदने के लिए उसने कुदाल चलाई कुदाल साही की मांद में जा लगी। जिससे कि साही का बच्चा मर गया। साहूकार की पत्नी को इसे लेकर काफी पश्चाताप हुआ, इसके कुछ दिन बाद ही उसके एक बेटे की मौत हो गई।
इसके बाद एक-एक करके उसके सातों बेटों की मौत हो गई. इस कारण साहूकार की पत्नी शोक में रहने लगी। एक दिन साहूकार की पत्नी ने अपनी पड़ोसी औरतों को रोते हुए अपना दुख की कथा सुनाई, जिस पर औरतों ने उसे सलाह दी कि यह बात साझा करने से तुम्हारा आधा पाप कट गया है।
अब तुम अष्टमी के दिन साही और उसके बच्चों का चित्र बनाकर मां भगवती की पूजा करो और क्षमा याचना करो. भगवान की कृपा हुई तो तुम्हारे पाप नष्ट हो जाएंगे। ऐसा सुनकर साहूकार की पत्नी हर साल कार्तिक मास की अष्टमी को मां अहोई की पूजा व व्रत करने लगी। माता रानी कृपा से साहूकार की पत्नी फिर से गर्भवती हो गई और उसके कई साल बाद उसके फिर से सात बेटे हुए। तभी से अहोई अष्टमी का व्रत करने की प्रथा चली आ रही है।
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