‘सुप्रीम’ फैसला
बुधवार को इजरायली स्पाइवेयर पेगासस जासूसी मामले में स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि लोगों की विवेकहीन जासूसी बिल्कुल मंजूर नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार को हर बार छूट नहीं मिल सकती। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नागरिकों …
बुधवार को इजरायली स्पाइवेयर पेगासस जासूसी मामले में स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया। न्यायालय ने कहा कि लोगों की विवेकहीन जासूसी बिल्कुल मंजूर नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार को हर बार छूट नहीं मिल सकती। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता। उनकी स्वतंत्रता को बरकरार रखने की जरूरत है।
अदालत के आदेश पर तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति मामले की जांच करेगी। पेगासस पर आया शीर्ष अदालत का यह फैसला महत्वपूर्ण है। विरोधी दल आरोप लगा रहे हैं कि ये सिर्फ निजता के हनन का ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ का मामला है। उम्मीद की जा सकती है कि जांच के बाद सच सामने आएगा। अब मामले में सरकार को अपनी भूमिका स्वीकार करनी पड़ेगी। दो-न्यायाधीशों की पीठ ने 13 सितंबर को आदेश सुरक्षित रखते हुए कहा था कि वह केवल यह जानना चाहते है कि केंद्र ने नागरिकों पर कथित तौर पर जासूसी करने के लिए अवैध तरीकों से पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल किया या नहीं। सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के चलते जवाब नहीं दे सकते।
यह मामला इजरायल की एक निजी कंपनी के स्पाइवेयर सॉफ्टवेयर से देश के प्रमुख पत्रकारों, वकीलों, कई विपक्षी दलों के नेताओं के फोन के माध्यम से कथित तौर पर उसकी जासूसी करने से जुड़ा हुआ है। याचिका में आरोप लगाए गए कि अवैध तरीके से लोगों की बातचीत एवं अन्य जानकारी ली गई है। मानसून सत्र के दौरान भी मामले को लेकर संसद के दोनों सदनों में जमकर हंगामा हुआ था। विपक्ष मामले की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच कराने की मांग करता रहा , जबकि सरकार इसे देश के खिलाफ षडयंत्र बताती रही।
जासूसी मामले में शीर्ष अदालत की टिप्पणी गौरतलब है कि निजता की रक्षा हर कोई चाहता है। निजता के अधिकार की कुछ सीमाएं हैं, लेकिन इसका हनन कानूनी तरीके से ही होना चाहिए। केंद्र को उस रुख को सही ठहराना चाहिए जो वे एक अदालत के समक्ष रखते हैं। इसीलिए मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बताने पर अदालत ने सरकार से कहा कि जो बता सकते हैं,उतना ही बताइए, लेकिन सरकार ने जवाब नहीं दिया। अदालत ने कहा कि मूकदर्शक बनकर नहीं बैठा जा सकता। अंत में अदालत ने याचिकाकर्ताओं के निजता के अधिकार को प्रमुखता देते हुए मामले में जांच के आदेश दिए।
