हल्द्वानी: कांग्रेस में लंबे समय से जमे जिलाध्यक्ष हटेंगे

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

अंकुर शर्मा, हल्द्वानी। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव-2022 से पहले जिलाध्यक्षों को बदलने की कसरत शुरू कर दी है। प्रदेश के सभी जनपदों के संगठनों की समीक्षा की जा रही है। फिर समीक्षा रिपोर्ट के आधार पर जिलाध्यक्ष को बदलने का फैसला लिया जाएगा। कांग्रेस सियासी समर-2022 में उतरने से पहले कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती …

अंकुर शर्मा, हल्द्वानी। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव-2022 से पहले जिलाध्यक्षों को बदलने की कसरत शुरू कर दी है। प्रदेश के सभी जनपदों के संगठनों की समीक्षा की जा रही है। फिर समीक्षा रिपोर्ट के आधार पर जिलाध्यक्ष को बदलने का फैसला लिया जाएगा।

कांग्रेस सियासी समर-2022 में उतरने से पहले कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। ऐसे पदाधिकारी जो किसी भी वजह से लंबे समय से पदों पर जमे हुए हैं। अब ऐसे पदाधिकारियों की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने राज्य के सभी जिलों में संगठन की समीक्षा शुरू कर दी है।

सूत्रों की मानें तो इसमें पदाधिकारियों के कार्यकाल में संगठन को मजबूती, आम चुनावों में जीत-हार, नेतृत्व क्षमता, कार्यकर्ताओं की पदाधिकारियों के प्रति राय और समर्थन एवं विरोध, कांग्रेस के प्रति समर्पण आदि कई बिंदुओं की समीक्षा की जा रही है। इस समीक्षा रिपोर्ट मंे मिले नंबरों के आधार पर जिलाध्यक्ष के भविष्य का फैसला होगा। यदि जिला संगठन समीक्षा रिपोर्ट में प्रदेश नेतृत्व के मानकों पर खरा नहीं उतरता है तो जिला संगठन में बदलाव किया जा सकता है।

प्रदेश के सभी जिलों की समीक्षा की जा रही है। समीक्षा के आधार पर कार्यकाल का आकलन किया जाएगा। फिर समीक्षा रिपोर्ट के आधार पर जिलाध्यक्ष को बदलने का फैसला लिया जाएगा।= गणेश गोदियाल, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड कांग्रेस

नियमानुसार तीन साल होता है एक जिलाध्यक्ष का कार्यकाल
कांग्रेस संगठन के जानकारों के अनुसार एक जिलाध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता है। कार्यकाल समाप्त होने पर जिला कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्यों में से डेलीगेट्स चुने जाते हैं। फिर ये डेलीगेट्स जिलाध्यक्ष के लिए वोट देते हैं। यदि सर्वसम्मति से जिलाध्यक्ष चुन लिया जाता है तो वोटिंग नहीं होती है। यह भी नियम है कि एक जिलाध्यक्ष अधिकतम दो बार ही चुना जाता है लेकिन योग्यता के आधार पर इस नियम की अनदेखी की जा सकती है।

20 सालों से जिलाध्यक्ष हैं सतीश नैनवाल 
नैनीताल जिले के दूसरे जिलाध्यक्ष सतीश नैनवाल बने। साल 2001-02 में जया बिष्ट हटने के बाद नैनवाल को जिलाध्यक्ष बनाया गया था। तब से अब तक तकरीबन 20 साल बाद भी नैनवाल ही जिलाध्यक्ष हैं। वह अपने कार्यकाल में चार-चार विधानसभा व लोकसभा के चुनाव देख चुके हैं। अगर कांग्रेस संगठन के नियमों की बात करें तो छह कार्यकाल से ज्यादा का समय पूरा कर चुके हैं और उनका यह सातवें कार्यकाल का दूसरा साल है।

उत्तराखंड में नैनीताल की पहली जिलाध्यक्ष थीं जया बिष्ट 
उत्तराखंड गठन के बाद नैनीताल की पहली जिलाध्यक्ष जया बिष्ट थीं। वह 1996 से 2001-02 तक पद पर रहीं। बाद में वह नैनीताल विधानसभा से चुनाव लड़ी तो उन्होंने पद से इस्तीफा दिया था। दरअसल, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत ने शर्त रखी थी कि यदि जिलाध्यक्ष विधानसभा चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। तब सतीश नैनवाल को जिलाध्यक्ष बनाया गया था।

हर दा ने दिए समीक्षा के निर्देश
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो देवेंद्र यादव के प्रदेश प्रभारी बनते ही लंबे समय से जमे जिलाध्यक्षों का मुद्दा उठा था। इस पर वह चुप्पी साध गए थे। इधर, हाल ही में चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष हरीश रावत ने सभी जिलाध्यक्षों की समीक्षा और समीक्षा के आधार पर बदलाव करने को कहा है। तब से प्रदेश नेतृत्व ने समीक्षा शुरू कर दी है।

संबंधित समाचार