हल्द्वानी: राज्य आंदोलन में शहीदों के परिजनों ने सुनाई आपबीती

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हल्द्वानी, अमृत विचार। राज्य आंदोलन के शहीदों के परिजनों ने अपनी व्यथा जब सुनाई तो पता चला कि इस राज्य को बनाने के लिए लोगों ने कितने बड़े बलिदान दिए हैं। आज भी अपने परिजनों को खोने की टीस उनके दिलों में है लेकिन उन्हें इस बात का गर्व भी है कि इस राज्य के …

हल्द्वानी, अमृत विचार। राज्य आंदोलन के शहीदों के परिजनों ने अपनी व्यथा जब सुनाई तो पता चला कि इस राज्य को बनाने के लिए लोगों ने कितने बड़े बलिदान दिए हैं। आज भी अपने परिजनों को खोने की टीस उनके दिलों में है लेकिन उन्हें इस बात का गर्व भी है कि इस राज्य के निर्माण के लिए उनके अपनों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

1994 में राज्य आंदोलनकारियों के साथ हुए गोलीकांड की घटना आज भी चर्चाओं का विषय रहता है। यह गोलीकांड खटीमा में हुआ था। नरेश चंद ने बताया कि जब उनके पिता गोपीचंद को गोली लगी थी तब उन्हें इसका पता चला। वह उस समय मुम्बई में थे।

मुंबई से दिल्ली के लिए तो ट्रेन मिल गई लेकिन दिल्ली से उत्तराखंड के लिए बस और ट्रेनों सभी पर रोक लगी हुई थी। उन्होंने दिल्ली से खटीमा तक का 327 किमी का सफर पैदल तय किया। तब यहां पर आकर उन्हें अपने पिता की लाश मिल पाई थी। पूरन सिंह ने बताया कि उनके पिता प्रताप सिंह आंदोलन के दौरान शहीद हो गए थे। उस समय पूरन की आयु दस साल की थी।

बहुत ही कम उम्र में पिता का साया उनके ऊपर से उठ गया। बाद में सरकार की ओर से कुछ आर्थिक मदद दी गई। अनिल भट्ट ने बताया कि जब उनके पिता धर्मानंद भट्ट की मृत्यु हुई तब उनकी उम्र भी कम थी। उस समय लोगों के दिला दिमाग पर राज्य आंदोलन सिर चढ़कर बोल रहा था। सरकारी मिशनिरियां आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही थी लेकिन वह सफल नहीं हो पा रही थी।

मुख्यमंत्री के सामने लगे न्याय दिलाने के नारे
उत्तराखंड महोत्सव के दौरान जैसे ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मंच पर संबोधन के लिए बोलने जा रहे थे तब ही श्रोताओं में बैठे लोगों में से कुछ लोग खड़े हुए और खटीमा गोलीकांड में शहीद हुए लोगों के दोषियों को सजा दिलाने की मांग करने लगे। इस वजह से वहां थोड़ी देर के लिए असहजता का माहौल भी बन गया था।

 

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