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Edited By Amrit Vichar
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दुनिया चुनौतियों के दौर से गुजर रही है। अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने व चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या में विस्तार के जरिए सुधार की मांग लगातार की जा रही है। सोमवार को संयुक्त राष्ट्र में भारत के उप स्थायी प्रतिनिधि राजदूत आर. …

दुनिया चुनौतियों के दौर से गुजर रही है। अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने व चुनौतियों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या में विस्तार के जरिए सुधार की मांग लगातार की जा रही है। सोमवार को संयुक्त राष्ट्र में भारत के उप स्थायी प्रतिनिधि राजदूत आर. रवींद्र ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के बढ़ते जटिल मुद्दों के समाधान की दिशा में प्रभावी ढंग से कार्य करने में असमर्थ है। क्योंकि इसमें समावेशी प्रतिनिधित्व का अभाव है। संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की मांग को लेकर भारत आक्रामक रवैया अपनाए हुए हैं।

इसी कड़ी में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति कह चुके हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, ‘एक ख़राब हो चुका अंग’ बन गया है। सितंबरमें जी 4 में शामिल भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान के विदेश मंत्रियों ने सुरक्षा परिषद को अधिक तर्कसंगत, प्रभावी और सभी का प्रतिनिधित्व करने वाला बनाने के लिए उसमें सुधार की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। भारत यूएनएससी में सुधार की मांग पिछले काफी समय से कर रहा है। दुनिया के कई देश भारत को बतौर सदस्य शामिल करने के पक्षधर भी हैं। सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनने की राह में भारत के सामने सबसे बड़ा रोड़ा चीन है।

चीन नहीं चाहता कि भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य बने। पाकिस्तान भी चीन पर दबाव बना रहा है। चीन को छोड़कर बाकी चारों स्थाई सदस्य भारत की दावेदारी का समर्थन कर चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र का गठन 1945 में हुआ था। भारत उसका एक संस्थापक सदस्य है। भारत का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र मौजूदा वक्त की सच्चाई के अनुसार परिवर्तित नहीं कर पाया है। भारत इस वैश्विक संस्था को मज़बूत करने के लिए ठोस उपाय करने की मांग लगातार उठाता रहेगा।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र में सुधार होना एक जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए कमेटी बनती है, सिफ़ारिशें तैयार होती हैं और इन पर वोटिंग होती है। इसके लिए सहमति होना ज़रूरी है। परंतु भारत की दावेदारी इस बात से भी मजबूत है कि वह जनवरी से सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्य के तौर पर कार्य कर रहा है और अपनी भूमिका जिम्मेदारी से निभा रहा है। भारत ने अगस्त में सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भी की। भारत को राजनयिक प्रयास पहले से ही करने चाहिए थे, जो नहीं हुए। अब मोदी सरकार इस मसले पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है।