अभियानों पर सवाल

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Edited By Amrit Vichar
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नागालैंड गोलीबारी के विरोध में एकजुट विपक्ष ने सोमवार को संसद में सरकार को घेरा। गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में स्वीकार किया कि रविवार को सेना की एक टुकड़ी की गलतफहमी से 13 निर्दोष लोगों की जान चली गई। राज्य पुलिस ने सेना इकाई के खिलाफ स्वतः संज्ञान कर एफआईआर दर्ज की है। सुरक्षा …

नागालैंड गोलीबारी के विरोध में एकजुट विपक्ष ने सोमवार को संसद में सरकार को घेरा। गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में स्वीकार किया कि रविवार को सेना की एक टुकड़ी की गलतफहमी से 13 निर्दोष लोगों की जान चली गई। राज्य पुलिस ने सेना इकाई के खिलाफ स्वतः संज्ञान कर एफआईआर दर्ज की है। सुरक्षा बलों पर हत्या का केस दर्ज किया गया।

सरकार ने घटना की जांच के लिए आईजीपी स्तर के एक अधिकारी की अध्यक्षता में एसआईटी गठित करने की घोषणा की है। साथ ही मारे गए लोगों के परिवारों को पांच-पांच लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का एलान किया है। सेना ने मामले की ‘कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी’ का आदेश दिया। इस घटना से उग्रवाद-विरोधी अभियानों पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या सेना ने इतने बड़े ऑपरेशन से पहले उग्रवादियों के बारे में मिली सूचना की पुष्टि नहीं की थी।

सेना की ओर से कहा गया है कि विश्वसनीय खुफिया जानकारी के आधार पर इलाके में एक विशेष अभियान चलाए जाने की योजना बनाई गई थी। पुलिस ने एफआईआर में लिखा है कि घटना के समय कोई पुलिस गाइड नहीं था और न ही सुरक्षा बलों ने अपने ऑपरेशन के लिए पुलिस गाइड के लिए पुलिस स्टेशन से अनुरोध किया था।

पूर्वोत्तर राज्य बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण हैं। नागालैंड का मोन जिला म्यांमार की सीमा के पास स्थित है। उग्रवादी संगठन एनएससीएन (के) का युंग ओंग गुट वहीं से अपनी गतिविधियां चलाता है। नागालैंड गुस्से में है। तमाम जनजातीय संगठनों ने सोमवार को राज्य में बंद रखा। सेना को बॉर्डर स्टेट के नाम पर अधिक से अधिक अधिकार दिए जाने पर बहस की संभावना फिर से उत्पन्न हो गई है। संसद में भी सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को खत्म करने की मांग की गई।

अफस्पा असम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग, लांगडिंग और तिराप जिलों के साथ असम की सीमा से लगे राज्य के आठ पुलिस थाना क्षेत्रों में लागू है। वहीं नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन का कहना है अगर केंद्र पूर्वोत्तर के लोगों के हितों के बारे में चिंतित है तो उसे इस कानून को निरस्त करना चाहिए।

ऐसा नहीं हुआ तो यह इलाके के लोगों में अलगाव की भावना को और मजबूत करेगा। सेना हो या कोई भी, सामूहिक हत्याओं की निंदा होनी चाहिए और उस इलाके के दोषियों को भी दंडित किया जाना चाहिए। घटना की जांच शीघ्र पूरी कर दोषियों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए। ऐसा नहीं होने की स्थिति में पूर्वोत्तर में शांति प्रक्रिया बाधित हो सकती है।