बनाएं नई रणनीति

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने की कोशिश की जा रही है, वहीं दूसरी ओर सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशों और आतंकी हमलों में तेजी आई है। पाकिस्तान लगातार भारत को अस्थिर करने का प्रयास करता रहता है। आतंकवादी घाटी के माहौल को खऱाब करना चाहते हैं ताकि विघटनकारी शक्तियों का फिर से प्रादुर्भाव …

जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने की कोशिश की जा रही है, वहीं दूसरी ओर सीमा पार से घुसपैठ की कोशिशों और आतंकी हमलों में तेजी आई है। पाकिस्तान लगातार भारत को अस्थिर करने का प्रयास करता रहता है। आतंकवादी घाटी के माहौल को खऱाब करना चाहते हैं ताकि विघटनकारी शक्तियों का फिर से प्रादुर्भाव हो। अगस्त 2019 में धारा 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल हुई और हालात सामान्य हुए। केंद्र की ओर से लगातार दावा किया जाता रहा कि घाटी में आतंकियों की पैठ समाप्त हो गई है।

युवाओं को गुमराह करने वाले संगठनों पर नकेल कसी जा चुकी है। इससे हताश आतंकी समूहों ने बौखलाहट में अस्थिरता पैदा करने के लिए अलग-अलग तरह की रणनीति बनाई। गत अक्टूबर में अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेकर टारगेट किलिंग की कवायद शुरू की। जब वे किसी तरह से कुछ भी नहीं कर पाए तो ड्रोन के जरिए ड्रग्स और हथियार भेजने की कोशिश करते रहे। मंगलवार को भी पुंछ में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में एक आतंकवादी मारा गया। सोमवार को राजधानी श्रीनगर के बाहरी इलाके जेवान में आतंकवादियों ने पुलिस की एक बस पर हमला किया, जिसमें तीन पुलिसकर्मी शहीद हो गए और 12 जवान घायल हुए।

हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद से संबद्ध एक आतंकवादी संगठन ने ली है। आईजीपी का कहना है कि 25 पुलिसकर्मियों को ले जा रही बस पर किया गया हमला पूर्व नियोजित था। एक हमलावर स्थानीय था जबकि दो अन्य विदेशी आतंकवादी थे। घटना से एक दिन पहले सीमा पार से घुसपैठ करने वालों के दल में शामिल एक महिला आतंकी को सुरक्षाबलों ने मार गिराया। इसके दो दिन पहले बांदीपोरा में आतंकियों ने सुरक्षाबलों पर ग्रेनेड से हमला किया, जिसमें दो जवान शहीद हो गए। ये घटनाएं देश के सामने चुनौती हैं।

पुलिस की बस पर हमला करने की घटना ने पुलवामा की याद दिला दी है। सीमा पार से आ रहे दल में से मारी गई महिला आतंकी की घटना से यह स्पष्ट है कि घुसपैठ की घटनाओं पर विराम लगाने में हमें पूरी तरह सफलता नहीं मिल पाई है। फिर इससे यह भी संकेत मिलता है कि पाकिस्तान की जमीन पर तैयार किए जा रहे चरमपंथियों में अब हर तरह के लोगों का उपयोग किया जा रहा है।

हमलावरों में स्थानीय आतंकवादी के शामिल होने की बात से सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या कश्मीरी युवाओं ने फिर से हाथों में हथियार उठा लिए हैं? क्या फिर से स्थानीय लोगों ने चरमपंथियों को पनाह देना शुरू कर दिया है? इस पर नकेल कसने के लिए नए सिरे से रणनीति बनाने की जरूरत है। सुनिश्चित किया जाए कि वहां जल्द से जस्द लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली हो।