हल्द्वानी: घर-घर अंगना रंग बनो है, खुशियों की रंगरेली….गणपति की वंदना से बैठकी होली का आगाज कल से…

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हल्द्वानी, अमृत विचार। देवभूमि उत्तराखंड के हर क्षेत्र में डेढ़ सौ साल से भी अधिक समय से शास्त्रीय संगीत पर आधारित बैठकी होली गायन की परंपरा से चली आ रही है। शीतकाल के पौष मास के प्रथम रविवार यानि आज से गणपति की वंदना से बैठकी होली का आगाज हो गया है। यह होली विभिन्न …

हल्द्वानी, अमृत विचार। देवभूमि उत्तराखंड के हर क्षेत्र में डेढ़ सौ साल से भी अधिक समय से शास्त्रीय संगीत पर आधारित बैठकी होली गायन की परंपरा से चली आ रही है। शीतकाल के पौष मास के प्रथम रविवार यानि आज से गणपति की वंदना से बैठकी होली का आगाज हो गया है। यह होली विभिन्न रागों में चार अलग-अलग चरणों में गाई जाती है जो होली टीके तक चलती है। पहाड़ में बैठकी होली गायन की परम्परा को प्राचीन काल से अब तक लोक संस्कृति प्रेमियों ने कायम रखा है। कड़ाके की ठंड में भी होली गीतों के रसिक इस बैठकी होली गायन में देर रात्रि तक उत्साहपूर्वक भागीदारी करते हैं।

बहुचर्चित पुस्तक कुमाऊं का होली गायन लोक एवं शास्त्र के लेखक, राजकीय महाविद्यालय टनकपुर चंपावत के संगीत विभागाध्यक्ष डॉ पंकज उप्रेती ने बताया कि होली का पर्व पूरे विश्व में मनाया जाता है और विशेषकर भारत के ब्रज क्षेत्र में। यहां से आनंद पूरे देश में फैलता है। होली नृत्य व गायन के रूप में, फूलों की होली, लट्ठमार होली आदि रूपों में मनायी जाती है।

ब्रज क्षेत्र को पूरी दुनिया में जाना जाता है। इसमें हमारे पहाड़ यानी उत्तराखंड में इसका जबरदस्त प्रभाव पड़ा है। क्योंकि यहां रास मंडलियां आती रही हैं, दरभंगा कन्नौज सहित विभिन्न राज्यों से संपर्क रहा है। कैलास मानसरोवर का यात्रा पथ भी उत्तराखंड ही है इसलिए लोगों का यहां आना-जाना शुरू से रहा है। ऐसे में संगीत का आदान-प्रदान तो होना ही था। जिसको हम पहाड़ की होली कहते हैं, ठंड में मनोरंजन का साधन भी था। इसी कारण से तीन चार महीने तक इसका गायन होता है और आज भी परंपरा के रूप में हमारे बीच है।

डा. उप्रेती बताते हैं कि जब एक संस्कृति एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाती है तो एक व्यक्ति के साथ उसके पूरे संस्कार भी साथ -साथ चलते हैं। पहाड़ में तमाम स्थानों से लोग आकर बसे, ऐसे में उनके साथ उनकी संस्कृति भी आई। शैली तो पर्वतीय हो गई, परन्तु इन गीतों की भाषा में कुमाऊंनी गढ़वाली या अन्य स्थानीय बोली के शब्द बहुत कम हैं। कुछ गीत या कुछ शब्द रूप में दिखते हैं।

वहीं बात करें प्रचलित बैठकी होली की तो इसमें लगने वाले स्वर शास्त्रीयता ओर जाते हैं जबकि खड़ी होली में अवकाश के अवसर में खड़े होकर, उमंगित होकर गाने में ज्यादा है। लोगों की उमंग ढोल-मंजीरे के साथ और बढ़ती जाती है तथा खड़े स्वर निकलने लगते हैं।

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