हल्द्वानी: संगोष्ठी में बोले वक्ता, संस्कृत साहित्य में छुपी है विश्व कल्याण और विश्व बंधुत्व की भावना
हल्द्वानी, अमृत विचार। संस्कृत वेदों की भाषा है, इसमें विश्व का समस्त ज्ञान समाया हुआ है। संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है। इसके महत्व को हमें समझना होगा। संस्कृत साहित्य में ही विश्व कल्याण व विश्व बन्धुत्व का ज्ञान मिलता है। यह बात उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित एक दिवसीय संस्कृत संगोष्ठी में मुख्य …
हल्द्वानी, अमृत विचार। संस्कृत वेदों की भाषा है, इसमें विश्व का समस्त ज्ञान समाया हुआ है। संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है। इसके महत्व को हमें समझना होगा। संस्कृत साहित्य में ही विश्व कल्याण व विश्व बन्धुत्व का ज्ञान मिलता है।
यह बात उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित एक दिवसीय संस्कृत संगोष्ठी में मुख्य अतिथि पूर्व न्यायाधीश व प्रमुख सचिव रामदत्त पालीवाल ने कही। संस्कृत शिक्षा सचिव वरिष्ठ आईएएस विनोद प्रसाद रतूड़ी ने कहा कि वर्तमान में संस्कृत भाषा के विकास के लिए अनेक प्रकार के कार्यक्रम किए जा रहे हैं। संस्कृत अकादमी द्वारा समय-समय पर सम्मेलन व गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। इसका उद्देश्य संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाना है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी परेशयति महाराज ने वेदों के महत्व के बारे में बताया। विशिष्ट अतिथि पूर्व राज्यमंत्री डॉ. अनिल कपूर डब्बू ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है।
प्रांतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष नवीन चंद्र वर्मा ने संस्कृत महाविद्यालयों को भी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की। कार्यक्रम में संस्कृत साहित्ये लोककल्याणं विश्वबन्धुत्वं च विषय पर विद्वानों ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में डॉ. नवीन चंद्र जोशी, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव गिरीश कुमार अवस्थी, डॉ. संजय सुनाल, डॉ. राजेन्द्र भट्ट, डॉ. नवीन चन्द्र बेलवाल, डॉ. चन्द्र, प्रकाश उप्रेती, डॉ. चन्द्र बल्लभ बेलवाल, जानकी त्रिपाठी, हरिप्रिया, महेश सुयाल, कीर्ति, अनुराग जोशी, सचिन भट्ट आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हरीश चन्द्र गुरुरानी ने किया।
