चिंता बढ़ाती बेरोजगारी
कोरोना के नए स्वरुप ओमिक्रान से उत्पन्न खतरे के बीच कई राज्यों में आंशिक प्रतिबंध लगने से आर्थिक गतिविधि प्रभावित हो सकती हैं। देश में कोरोना का कहर फिर से बढ़ता जा रहा है। पिछले 24 घंटे में 58 हजार से अधिक मामले सामने आए हैं। साथ ही बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ने लगी है। …
कोरोना के नए स्वरुप ओमिक्रान से उत्पन्न खतरे के बीच कई राज्यों में आंशिक प्रतिबंध लगने से आर्थिक गतिविधि प्रभावित हो सकती हैं। देश में कोरोना का कहर फिर से बढ़ता जा रहा है। पिछले 24 घंटे में 58 हजार से अधिक मामले सामने आए हैं। साथ ही बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ने लगी है। दिसंबर में यह बढ़कर देश में चार महीने के उच्चस्तर 7.91 प्रतिशत पर पहुंच गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली संस्था, सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनमी, सीएमआईई के मुताबिक गत माह दिसंबर में शहरों में बेरोजगारी दर 9.30 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई है। इन आंकड़ों के आने के बाद विपक्ष सरकार पर हमलावर है।
विपक्षी पार्टियों का कहना है कि एक तरफ जनता महंगाई की मार से परेशान है और दूसरी तरफ देश में बेरोजगारी की दर उच्च स्तर पर जा पहुंची है। कोरोना को लेकर सरकार की नीतियों से बेरोजगारी बढ़ी है और जीडीपी कम हुई तथा देश 70 साल पीछे चला गया है। जबकि सीएमआईई के अनुसार दिसंबर, 2021 में रोजगार बढ़ा है लेकिन नौकरी के इच्छुक लोगों की संख्या उससे अधिक रही। लगभग 83 लाख अतिरिक्त लोग नौकरी की तलाश में थे। हालांकि, 40 लाख नौकरी चाहने वालों को ही रोजगार मिला। वहीं सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े नेता कह रहे हैं कि देश में लगातार रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और इसी वजह से देश की जीडीपी भी पिछले साल की दूसरी तिमाही की तुलना में इस साल 8 फीसदी से ज्यादा रही है।
कोरोना की दूसरी लहर और उसके चलते विभिन्न राज्यों में आर्थिक गतिविधियों में ठहराव आ गया था। कहीं वे पूरी तरह से थम गईं तो कहीं अवरुद्ध हो गई और इसका असर नौकरियों पर भी पड़ा। लेकिन अकेले महामारी पर इसका दोष मढ़ देना क्या जमीनी हकीकत से मुंह फेरने की तरह नहीं होगा? देश में ऊंची बेरोजगारी दर के पीछे एक बड़ा कारण सार्वजनिक क्षेत्र का लगातार सिमटते जाना भी है। क्या हम रोजगार विहीन विकास दर के दौर से नहीं गुजर रहे हैं।
सरकार की नीतियां रोजगार पैदा करने की होनी चाहिए। लेकिन सारी कवायद विकास दर हासिल करने की है। नीति-नियंताओं का मानना है कि विकास दर बढ़ेगी तो रोजगार के मौके भी बनेंगे। लेकिन यह पद्धति पहले ही विफल हो चुकी है। केंद्र ही नहीं राज्यों की सरकारों की कार्यक्षमता के लिए भी ये परीक्षा की घड़ी है। बेरोजगारी के संकट से निपटने के लिए केंद्र को दूरगामी नीति बनानी होगी। वरना आगे चलकर आर्थिक सुधार पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
