कड़वी सच्चाई

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Edited By Amrit Vichar
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कोरोना महामारी के दौरान दो साल में दुनिया में तेजी से असमानता बढ़ी है। 16 करोड़ से अधिक लोग गरीब की श्रेणी में आ गए जबकि दुनिया के दस सबसे अमीर लोगों की संपत्ति प्रतिदिन 9,000 करोड़ रुपये की दर से बढ़कर 111 लाख करोड़ रुपये से अधिक पर पहुंच गई। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) …

कोरोना महामारी के दौरान दो साल में दुनिया में तेजी से असमानता बढ़ी है। 16 करोड़ से अधिक लोग गरीब की श्रेणी में आ गए जबकि दुनिया के दस सबसे अमीर लोगों की संपत्ति प्रतिदिन 9,000 करोड़ रुपये की दर से बढ़कर 111 लाख करोड़ रुपये से अधिक पर पहुंच गई। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के ऑनलाइन दावोस एजेंडा शिखर सम्मेलन में सोमवार को जारी ऑक्सफैम इंटरनेशनल रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के दस सबसे धनी व्यक्तियों की महामारी के दौरान हुई अप्रत्याशित कमाई पर एकमुश्त 99 प्रतिशत कर पूरे विश्व के लोगों को कोरोना रोकथाम के पर्याप्त टीके, सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अधिक कचोटने वाली बात है कि असमानता की वजह से प्रतिदिन कम से कम 21,000 लोग या प्रति चार सेकंड में एक व्यक्ति की मौत हो रही है। कुछ लोगों के लिए आपदा कैसे अवसर बन आई इसे यूं समझा जा सकता है कि अरबपतियों की संपत्ति पिछले 14 साल की तुलना में महामारी के पिछले दो साल में सबसे तेजी से बढ़ी है। महामारी के दौरान अमीरों ने जमकर कमाई की। 99 प्रतिशत आबादी की आय मार्च 2020 से अक्टूबर 2021 तक कम हुई। भारत में भी अरबपतियों की संख्या 39 फीसदी बढ़कर 142 हो गई। चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत में दुनिया में तीसरे सबसे अधिक अरबपतियों की संख्या है।

इनके पास कुल 719 अरब डॉलर की संपत्ति है। महामारी के दौरान इन लोगों ने राष्ट्रीय संपत्ति का 45 फीसदी हिस्सा हासिल किया।
असमानता की कड़वी सच्चाई इस ओर इशारा करती है कि यह आर्थिक असमानता देश के संपूर्ण विकास के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसे में सवाल केवल आर्थिक असमानता बढ़ने का ही नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक विषय भी है। चूंकि असमानता में यह उछाल ऐसे समय में आया है जब भारत की बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों में 15 प्रतिशत तक थी और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली चरमराने के कगार पर थी। नि:संदेह कोरोना महामारी जनित कारणों ने असमानता को बढ़ाने में योगदान दिया है।

लेकिन केवल महामारी ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। यह रुझान तंत्र की खामियों और नीति-नियंताओं की लोककल्याण के मुद्दों के प्रति उदासीनता को भी दर्शाता है। हमारे नीति-नियंताओं को बढ़ती आर्थिक असमानता के विषय में गंभीर रूप से विचार करते हुए इसके निवारण की दिशा में आवश्यक पहल करनी चाहिए।