रायबरेली में बागियों को धूल चटाने के लिए कांग्रेस मार सकती मास्टर स्ट्रोक

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Edited By Amrit Vichar
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रायबरेली। कांग्रेस को अपने रायबरेली में आजादी के बाद कभी भी बागी विधायकों का सामना नहीं करना पड़ा। 1951 से लेकर 2017 तक के विधानसभा चुनाव में रायबरेली का चुनावी माहौल कांग्रेस के अनूकूल रहा है। आपातकाल, राम लहर, अटल लहर और मोदी लहर में भी कांग्रेस़ के विधायक बागी नहीं हुए और न ही …

रायबरेली। कांग्रेस को अपने रायबरेली में आजादी के बाद कभी भी बागी विधायकों का सामना नहीं करना पड़ा। 1951 से लेकर 2017 तक के विधानसभा चुनाव में रायबरेली का चुनावी माहौल कांग्रेस के अनूकूल रहा है। आपातकाल, राम लहर, अटल लहर और मोदी लहर में भी कांग्रेस़ के विधायक बागी नहीं हुए और न ही विधायक रहते हुए पार्टी की लीक को तोड़ा।

पहली बार ऐसा हुआ जब सदर विधायक रही अदिति सिंह और हरचंदपुर विधायक राकेश सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ बगावत कर दी और कांग्रेस के विधायक होने के बाद भी भाजपा का पक्ष लिया। बाद में कांग्रेस छोड़ भाजपा का कमल थाम लिया। ऐसी स्थिति में कांग्रेस विधानसभा चुनाव में पहली बार रायबरेली के चुनाव में बिना किसी विधायक के उतर रही है।

इस स्थिति में कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने रायबरेली की कमान हाथ में ली है। कांग्रेस का थिंक टैंक अदिति सिंह और राकेश सिंह को हराने के लिए बड़ा दांव चलने की रणनीति तैयार कर रहा है।

सदर सीट पर कांग्रेस का कब्जा सन 1951 के चुनाव से रहा है। 13 बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। 1967 में पहली बार कांग्रेस के मदन मोहन मिश्रा विधायक बने। 1969 में मदन मोहन मिश्रा दोबारा विधायक बने। वहीं इसके बाद 1974 में सुनीता चौहान, 1977 में मोहन लाल त्रिपाठी, 1980 और 1985 में रमेश चंद्र कांग्रेस से विधायक बने।

वहीं 1989 में कांग्रेस का विजय रथ थमा और 1991 तक लगातार दो बार जनता दल से अशोक सिंह विधायक बने। उसके बाद अखिलेश सिंह 1993, 1996, 2002 में कांग्रेस से विधायक रहे और फिर 2017 में अखिलेश की पुत्री अदिति सिंह विधायक बनी। कांग्रेस से जीतने के बाद 2019 में अदिति के स्वर कांग्रेस के खिलाफ. हो गए और उन्होंने पार्टी के खिलाफ बगावती तेवर अपना लिए। आखिर में 31 दिसंबर 2021 को वह भाजपा में शामिल हो ग ईं और भाजपा ने सदर सीट से उनको टिकट भी दे दी है।

इसी तरह हरचंदपुर सीट भी कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। पहले यह सीट सतांव के नाम थी और 2012 में यह हरचंदपुर विधानसभा बन गई। सन 2002 से 2012 तक यह सीट कांग्रेस के हाथ  से छिटक गई लेकिन 2017 में कांग्रेस प्रत्याशी राकेश सिंह विधायक बने लेकिन उनके भाई एमएलसी दिनेश सिंह अप्रैल 2017 में भाजपा में शामिल हो गए तो राकेश सिंह भी बागी हो गए।

विधायकी जाने के खतरे से वह कांग्रेस से जुड़े रहे लेकिन उनकी निष्ठा भाजपा में रही तथा उन्होंने भी भाजपा का दामन थाम लिया तथा भाजपा ने पहली बार हरचंदपुर सीट को जीतने के लिए राकेश सिंह को प्रत्याशी बना दिया है।

अब कांग्रेस के मुख्य निशाने पर यही दो प्रत्याशी हैं। ऐसे में सदर सीट से प्रियंका गांधी के खुद उतरने की संभावना है तो साथ कांग्रेस के कद्दावर नेता प्रमोद तिवारी की बेटी अराधना तिवारी के लिए भी सदर सीट से जमीन तैयार की जा रही है।

वहीं हरचंदपुर से पूर्व मंत्री शिव गणेश लोधी की बहू को मैदान में उतारने की चर्चा है। साथ ही पूर्व विधायक अशोक सिंह की बहू को भी चुनाव में उतारने की गणित बनाई जा रही है। कांग्रेस के लिए रायबरेली की सदर और हरचंदपुर सीट नाक का सवाल बन गई है।

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