संभल : बुजुर्गों को भूले नेताजी, भा रहा युवाओं का साथ
संभल,अमृत विचार। 20 वर्ष पहले और आज के चुनाव प्रचार में बहुत बदलाव आ गया है। पहले नेताजी बुजुर्ग लोगों को साथ लेकर मोहल्ले-मोहल्ले, गांव-गांव जाकर वोट मांगते थे। लेकिन, अब वह युवाओं को साथ लेकर वोट मांग रहे हैं। जब बुजुर्गों से पूछा गया कि 20 वर्ष पहले चुनाव प्रचार कैसे किया जाता था, …
संभल,अमृत विचार। 20 वर्ष पहले और आज के चुनाव प्रचार में बहुत बदलाव आ गया है। पहले नेताजी बुजुर्ग लोगों को साथ लेकर मोहल्ले-मोहल्ले, गांव-गांव जाकर वोट मांगते थे। लेकिन, अब वह युवाओं को साथ लेकर वोट मांग रहे हैं। जब बुजुर्गों से पूछा गया कि 20 वर्ष पहले चुनाव प्रचार कैसे किया जाता था, तो उन्होंने कहा कि पहले चुनावी दौर में नेताजी घर आते थे और काफी देर वक्त बिताकर अपनी पार्टी की नीतियों के बारे में जानकारी देते थे।
इस दौरान वह घर के बुजुर्गों से कहते थे कि बाबा, दादा इस बार आशीर्वाद देना और अपने क्षेत्र की जनता से मेरे लिए वोट मांगना। मगर आज के समय में चुनाव प्रचार में बहुत बदलाव देखने को मिल रहा है। इस आधुनिक दौर के चुनाव में नेताजी बुजुर्गों को भूल गए हैं। इस बार चुनाव आयोग ने रैलियों और जनसभाओं पर रोक लगा रखी है। ऐसे में वह ऑनलाइन प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। वहीं कुछ नेता गांव-गांव पहुंच युवाओं के साथ चुनाव प्रचार कर रहे हैं। बुजुर्गों से कोई परामर्श भी नहीं कर रहा है।
राजनीतिक पार्टियों ने प्रत्याशी भी घोषित कर दिए हैं। सभी दावेदार दमखम से युवाओं की फौज लेकर क्षेत्र में भ्रमण कर वोट मांग रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी प्रचार कर रहे हैं। लेकिन, बुजुर्गों के साथ में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है। गांव सौंधन में वृद्ध लोगों का कहना था कि पहले नेताओं पर विश्वास रहता था कि कुछ अच्छा करने के लिए चुनावी मैदान में उतरे हैं। अब तो राजनीति में विश्वास खत्म होने लगा है। कुछ राजनेताओं के लिए राजनीति मुनाफे का सौदा बनकर रह गई है।
शिवनारायण सिंह का कहना है कि 20 वर्ष पहले चुनाव के दौरान प्रत्याशी मोहल्ला-मोहल्ला जाकर लोगों के पास बैठते थे उनके साथ वक्त बिताते थे। चुनाव के बारे में लोगों से चर्चा करते थे। पहले प्रत्याशी बुजुर्गों के पैर छूकर वोट मांगते थे, उसके बाद उन्हें साथ लेकर पूरे गांव में घूम कर वोट मांगते थे। अब बुजुर्गों की जगह युवाओं ने ले ली है।
होरी लाल भगत जी कहते हैं कि अब चुनाव प्रचार के समय में नेता बुजुर्गों को पूरी तरह भूल चुके हैं। प्रचार के दौरान किसी भी प्रत्याशी के साथ बुजुर्ग दिखाई नहीं देते। वे गांव में आते हैं तो उनके साथ युवा ही दिखाई देते हैं। 25 वर्ष पहले नेता घर-घर आते और जो गांव के सम्मानित लोग हुआ करते थे, उनके पास बैठकर सलाह लिया करते थे।
