Valentine Week: उफ्फ ये गर्मी! माथे से पोंछते पसीने के अंदाज ने छीन लिया दिल
रजनेश सक्सेना, बरेली। …कहते हैं प्यार जब होता है तब दिल बेकाबू हो जाता है। ये प्यार कब और कहां हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता है। सामने वाले की कौन सी अदा घायल कर जाएगी, इसका पता घायल होने के बाद ही चलता है। सामने नजर आता है तो बस उसी का चेहरा। …
रजनेश सक्सेना, बरेली। …कहते हैं प्यार जब होता है तब दिल बेकाबू हो जाता है। ये प्यार कब और कहां हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता है। सामने वाले की कौन सी अदा घायल कर जाएगी, इसका पता घायल होने के बाद ही चलता है। सामने नजर आता है तो बस उसी का चेहरा। अगर दिल में सच्ची मोहब्बत हो तो एक नजर का प्यार सात जन्मों का रिश्ता बन जाता है। ऐसे ही एक सच्ची कहानी से हम आपको रूबरू करवाने जा रहे हैं। जिसमें लड़की की एक अदा ने ऐसे दिल को धड़काया कि कई साल के इंतजार के बाद आखिर दोनों एक हो गए। बरेली के अमित रंगकर्मी और गरिमा की कहानी कुछ ऐसी ही है। अमित को गरिमा के साथ आज भी अपनी पहली मुलाकात और साथ में बिताया हर एक पल याद है। अमित ने अपने प्यार का किस्सा कुछ इस तरह बयां किया…
प्यार… इस शब्द के बारे में मैंने कई लोगों से सुना। प्यार में जान देने वाले भी देखे। मगर हकीकत में प्यार क्या होता है…? शायद में इस शब्द से अंजान था। जिंदगी में कई लड़कियों के साथ मेरी दोस्ती थी। हर दिन हद से ज्यादा बातचीत होती थी। मगर मैं अपना दिल उस दिन हार बैठा जब वो… सामने से साइकिल पर सवार यलो रंग पर रेड लाइन की शर्ट पहनकर उतरी और माथे से पसीना पोंछा। उफ्फ.. वो पसीना पोंछने की अदा और बड़ी-बड़ी आंखे…। मैं वहीं पर अपना दिल हार बैठा। यह उन लड़कियों से अलग थी। उसे देखते ही दिल कितनी तेजी से धड़का शायद मुझे इसका अंदाजा आज भी है। जब वह पास से गुजरी तो काफी देर तक मैं खुद को संभालने में लगा रहा। उस लड़की का नाम था गरिमा।
यह बात है वर्ष 2010 की
अमित रंगकर्मी बताते है.. मैं एक रंगकर्मी हूं और यह बात है 2010 की। उस वक्त मैं रंग विनायक थियेटर में मैं काम करता था। उसी थियेटर में काम करने के लिए गरिमा आई थी। उसके बाद मैने गरिमा से धीरे-धीरे अपनी मुलाकातें बढ़ाना शुरू की। हमारी दोस्ती हो गई। मुझे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि गारिमा मेरे लिए कुछ महसूस करती है या फिर नहीं। दो सालों तक हम लोगों ने एक दोस्त की तरह काम किया। एक दिन जब मैने गारिमा से उसका नंबर मांगा तो उसने कहा कि क्या करोगे नंबर का? यहां आते तो है… यहीं पर बात हो तो जाती है । मैंने कहा कि कभी कुछ अर्जेंट हुआ तो बात कर लेंगे। तब उसने बड़ी मुश्किल से मुझे अपना नंबर दिया वो भी अपनी मां का। मगर मैं उससे भी खुश था। चलो कोई सा नंबर तो मिला। उस वक्त मैंने भी लगे हाथों गरिमा को अपना नंबर पकड़ा दिया।
शायरी लिख-लिखकर होती थी बात
अब गरिमा का नंबर तो मिल गया था। मगर उससे बात कैसे हो। एक तो फोन कॉल का रेट बहुत था। दूसरी ओर मां का नंबर होने की वजह से दिल में एक डर भी था। इन्हीं सब असमंजस के बीच मेरे पास एक फोन आया। बोली- मैं गरिमा बोल रही हूं। बस यह सुनते ही दिल जोरों से धड़कने लगा। मैंने कहा कि हां, बोलो- तो गरिमा ने उस समय एक स्कूल में होने वाले प्ले के लिए मुझसे स्क्रिप्ट के डायलॉग मांगे थे। बस उस दिन के बाद हमारी बातें होना शुरू हो गई। उस वक्त कॉल कम मैसेज से ज्यादा बात हुआ करती थी। मगर दिल में एक डर भी था कि कहीं उनकी मां ने मैसेज पड़ लिए तो मामला बिगड़ सकता है। इसलिए मैं शायरी लिख-लिखकर बात किया करता था। इसका यह फायदा था कि अगर कभी गरिमा की मां ने पकड़ लिया तो बहाना तैयार है कि प्ले के लिए शायरी भेजी थी। हालांकि बातचीत के कुछ दिनों बाद गरिमा ने मुझे अपना नंबर दे दिया था। इस तरह दो वर्ष कब बीत गए मुझे खुद पता नहीं चला।
2012 में जब थियेटर छोड़ा तो लगा बुरा
दो साल बाद 2012 में गरिमा ने थियेटर छोड़कर एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। तब मुझे बहुत बुरा लगा। हालांकि उस वक्त भी मेरी बात गरिमा से लगातार होती थी। मैंने काफी बार बुलाने की कोशिश की मगर गरिमा तैयार नहीं हो रही थी। उस वक्त तक मैंने भी रंग प्रशिक्षु के नाम से खुद का एक ग्रुप तैयार कर लिया था। मैंने कहा कि मैरे ग्रुप के साथ काम कर लो। मगर तब भी वह नहीं मानी। इसी मनाने और मना करने में काफी दिन बीत गए।
प्रपोज किया तो बोली- पागल हम दोस्त हैं
गरिमा के स्कूल में पढ़ाने के दौरान ही 2012 में एक दिन जब हम मिले तो मैंने गरिमा को प्रपोज कर दिया। पहले तो वह कुछ सकपकाई फिर बोली- पागल हम दोस्त है और एक अच्छे दोस्त की तरह रहते है। यह बात कहकर उसने टाल दिया। दिल को थोड़ा बुरा तो लगा… मगर हमारी बात बंद नहीं हुई। फिर से मैंने गरिमा को अपने साथ जुड़ने के लिए कहा। तो वह 2012 के लास्ट में मान गई। इसके बाद हम दोनों साथ में काम करने लगे।
पूरे 1 साल बाद किया प्रपोजल स्वीकार
साथ में काम करते-करते अब एक साल और बीत चुका था। अब वर्ष 2013 के भी कई महीनें बीत चुके थे। एक दिन दोनों एक जगह पर बैठे बातचीत कर रहे थे। मगर मुझे यह नहीं पता था कि अब गरिमा भी मेरे लिए पसंद करने लगी थी। मैंने कहा कि अगर तुम एमपीएसडी (मध्य प्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा) का एग्जाम क्लियर कर लो तो मैं तुमसे शादी कर लूंगा। इस पर गरिमा ने मुस्कुराते हुए कहा कि तुमने तो शर्त रख दी। अगर ऐसे भी बोलते तो भी मैं मना नहीं करती। मगर अब तो बात शर्त पर है। तो एग्जाम क्लियर करने के बाद ही बात होगी। हालांकि उसके बाद गरिमा ने एग्जाम क्लियर भी कर दिया। अब दोनों तैयार हो चुके थे।
लंबी दूरी का डिस्टेंस हो रहा था बर्दाशत से बाहर
एमपीएसडी क्लियर करने के बाद अब गरिमा मध्य प्रदेश के भोपाल में जा चुकी थी और मैं यहां पर अकेला था। फोन पर दोनों की बातचीत होती थी। मगर वो दूरी अब मुझसे बर्दाशत नहीं होती थी। अब सिर्फ उससे मिलने और बात करने की तड़प रहती थी। इसी बीच गरिमा का बर्थडे आ गया। आनन फानन में भोपाल का टिकट कराया। मगर वो ट्रेन मिस हो गई। फिर फ्लाइट से जाने की योजना बनाई तो कोई फ्लाइट नहीं मिली। इसके बाद मैंने 9 हजार रुपए में एक टैक्सी की। जब तक वहां पहुंचे। गरिमा अपना बर्थडे सेलिब्रेट कर चुकी थी। मुझे केक का एक टुकड़ा तक न मिला। हां, मगर गरिमा के मिलने से दिल को जो सुकून आया। कुछ देर हम दोनों ने साथ में समय बिताया और फिर मैं वहां से चला आया। इसके बाद मैं आए दिन गरिमा से मिलने के लिए भोपाल पहुंच जाता था। इसी तरह से हमारा वो साल भी गुजर गया।
शादी में आई कई अड़चने
हम दोनों की रिलेशनशिप को अब लगभग लगभग में तीन वर्ष हो चुके थे। मैंने अपने परिवार में गरिमा के बारे में पहले ही बता दिया था। चूंकि इससे पहले मेरी मां एक कैंसर पेशेंट थी तो उस वक्त गरिमा का मेरे घर पर आना जाना था। उस वक्त गरिमा मेरी मां की काफी देखभाल किया करती थी। जिसकी वजह से मां को तो वह बहुत ही पंसद आई। अब जब शादी की बात आई तो मैंने अपने परिवार में बात की तो मेरे परिवार के तो सभी सदस्य मान गए। मगर गरिमा के मां मानने को तैयार नहीं थी। पहला रीजन आया ऐज फैक्टर, क्योंकि मेरी और गरिमा की उम्र में कई साल का अंतर था। मगर गरिमा के पिता एकदम कूल थे। उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं थी। इसी बीच एक दिन मैं और गरिमा के मां-पापा लस्सी पीने के लिए गए। उसी वक्त बात हुई। तो गरिमा के पिता ने कहा कि अगर हम शादी के लिए मान भी जाएं तो तुम्हारे परिवार वालों को तो कोई समस्या नहीं है। तो मैने पट्ट स जबाव दिया कि नहीं, तो उन्होंने कहा कि आगे जो भी होगा वो तुम ही झेलोगे। फिर चाहे गारिमा जैसी भी है। मैने तुरंत उनकी हां में हां मिला दी। इसके बाद वह मान गए।
…और हो गई शादी
गरिमा की पेरेंट्स की हां मिलने के बाद मेरी खुशी का ठिकाना न था। अब तो बस शादी का ख्याल दिल में घुमने लगा था। हम दोनों बहुत खुश थे। और आखिरकार… 31 मई 2015 को हम एक दूजे के हो गए। अब हमारे एक बेटा भी है, जो 28 मार्च को पैदा हुआ। इस तरह से यह लव स्टोरी पहुंची एक मुकाम तक।
