उत्तराखंड की एक सड़क जहां ब्रिटिश राज में भारतीयों और कुत्तों का प्रवेश था वर्जित
उत्तराखंड की वादियों की खूबसूरती किसी से छुपी नहीं है। यहां दूर-दूर तक फैले हरे भरे जंगल और ठंडी हवा के बीच गुजरना और समय बीताना हर किसी को भाता है। यही वजह है कि देश-दुनिया के पर्यटक यहां पहुंचकर सुकून का एहसास करते हैं। ऐसा ही एक खूबसूरत शहर है मसूरी, जहां मानो प्रकृति …
उत्तराखंड की वादियों की खूबसूरती किसी से छुपी नहीं है। यहां दूर-दूर तक फैले हरे भरे जंगल और ठंडी हवा के बीच गुजरना और समय बीताना हर किसी को भाता है। यही वजह है कि देश-दुनिया के पर्यटक यहां पहुंचकर सुकून का एहसास करते हैं।
ऐसा ही एक खूबसूरत शहर है मसूरी, जहां मानो प्रकृति ने पूरी कायनात ही बिखेर दी हो। बात अगर इस पर्यटक स्थल के इतिहास की करें तो मसूरी पहला हिल स्टेशन था, जहां स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था की गई थी। वेल्स बंदोबस्त के बाद 1842 के नियम 10 के तहत इस क्षेत्र के नियमन के लिए एक स्थानीय समिति का गठन किया गया। अंग्रेजों के आने से पहले मसूरी चरवाहों का अड्डा हुआ करता था। यहां उगने वाली मंसूर झाड़ी को पशु चरते थे। इसी मंसूर झाड़ी के नाम इस स्थान का नाम मसूरी पड़ा।

मसूरी की मुख्य सड़क को मॉल रोड के नाम से जाता था जो कि पिक्चर पैलेस से शुरू होकर लाइब्रेरी तक जाती थी। ब्रिटिश काल में भारतीय लोग मॉल रोड पर नहीं जा सकते थे। यहां की मॉल रोड के सामने लगे बोर्ड पर मोटे अक्षरों में लिखा था- भारतीयों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। 1901 तक मसूरी की जनसंख्या 6,461 थी जो गर्मियों के समय में 15,000 तक हो जाती थी। 80 के दशक तक मसूरी की बाजार सर्दियों में तीन महीनों के लिये बंद रहती थी पर अब ये बाजार हमेशा खुली रहती है।
मसूरी को विश्व के मानचित्र पर स्थापित करने में सर जॉर्ज एवरेस्ट का बड़ा योगदान है। सर जॉर्ज एवरेस्ट भारत के पहले महा सर्वेक्षक थे। 1832 में मसूरी में महा सर्वेक्षक के कार्यालय की स्थापना हुई। संसार की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा।

शुरुआत में मसूरी का विकास अलग शहर के रूप में हुआ। अनुकूल मौसम ने बहुत से ब्रिटिश नागरिकों को मसूरी की ओर आकर्षित किया। ऐसे में ब्रिटिश सरकार ने 1927 में लंढौर में सैनिकों के लिए स्वास्थ्य लाभ डिपो की स्थापना की। जिसके बाद मसूरी ने तेजी से विकास किया और मसूरी अंग्रेजों के लिए स्वास्थ्य लाभ करने की जगह बन गया। 1828 में लंढौर बाजार की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई। 1829 में यहां दैनिक उपभोग के लिए जरूरी सामानों की बिक्री का व्यवसाय शुरू हुआ। यह व्यवसाय जिस भवन में शुरू हुआ था वहां आज डाकघर है। मसूरी में पहला विद्यालय 1834 में श्री मैकिनोन ने स्थापित किया और 1836 में यहां क्राइस्ट चर्च की स्थापना हुई। इसकी स्थापना बंगाल इंजीनियर्स के रेनी टेलर ने करवाई थी। मसूरी में हिमालयन क्लब की स्थापना 1841 में हुई। 1850 में भारत की पहली बीयर की फैक्ट्री भी मसूरी में ही बनी।

मसूरी में पहला उत्तर-पश्चिम बैंक 1836 में स्थापित हुआ था। कुछ समय के लिए इसका उपयोग सरकारी बैंक के रूप में हुआ। यह मसूरी में रहने वाले सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवार के लोगों की सुविधा के लिए पूंजी कोष के रूप में काम करता था। यह बैंक 1842 में बंद भी हो गया। 1859 में द डैल्ही एंड लंदन बैंक और 1862 में द बैंक ऑफ अपर इंडिया, 1874 में द हिमालय बैंक और 1891 में एलायंस बैंक ऑफ शिमला को खोला गया। अप्रैल 1959 में जब दलाई लामा चीन अधिकृत तिब्बत से निर्वासित हुए थे तो वो मसूरी में ही आकर रहे और यहीं उन्होंने तिब्बत निर्वासित सरकार बनाई जिसे बाद में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थानांतरित कर दिया।

बात अगर कब्रिस्तान की करें तो कैमिल बैक सेमेंट्री मसूरी का सबसे पुराना कब्रिस्तान है। यहां की कुछ कब्रों पर लिखी गई तारीख मसूरी के शुरुआती दिनों की हैं। यहां मसूरी के निर्माणकर्ता, ब्रिटिश सेना के जनरल व उनके सैनिक, बच्चे, शिक्षक और बहुत सारे गणमान्य लोगों की कब्रें हैं। यहां पर ऑस्ट्रेलियाई मूल के उपन्यासकार जॉन लैंग, पहाड़ी विल्सन के नाम से प्रसिद्ध फ्रैडिक विल्सन और क्रिमियन युद्ध में भाग लेने वाले अल्फ्रेड हिंडमार्श की कब्र है।
