हल्द्वानी: राज्य आपदाग्रस्त लेकिन फिर भी आपदा मुद्दा नहीं
नरेन्द्र देव सिंह, अमृत विचार, हल्द्वानी। आपदाओं से ग्रस्त रहने वाले राज्य उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जलवायु परिवर्तन का असर यहां दैवीय आपदा के रूप में दिखता है। राज्य में जान और माल का नुकसान होता है। राज्य में विकास अवरूद्ध हो जाता है। इसके बाद भी प्रमुख पार्टियों के चुनावी घोषणा …
नरेन्द्र देव सिंह, अमृत विचार, हल्द्वानी। आपदाओं से ग्रस्त रहने वाले राज्य उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जलवायु परिवर्तन का असर यहां दैवीय आपदा के रूप में दिखता है। राज्य में जान और माल का नुकसान होता है। राज्य में विकास अवरूद्ध हो जाता है। इसके बाद भी प्रमुख पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र में इस ओर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया है।
केदारनाथ आपदा के बाद से उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण की कई बातें हुईं। हालांकि पर्यावरण संरक्षण का काम बातों में ज्यादा हुआ और हकीकत में कम देखने को मिला। हिमालयी वैज्ञानिक कह चुके हैं कि हिमालय में जलवायु परिवर्तन की वजह से यहां दैवीय आपदाओं का सिलसिला बढ़ा है। बादल फटने की घटनाएं यहां प्रमुख समस्या है। जिसका कारण ग्लोबल वार्मिंग को माना जा रहा है। वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय के लिटिल आइस एज( 1450 ईस्वी से लेकर 1850) के बाद उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार में तेजी आई है।
हिमालय क्षेत्र की बात करें तो आठ हजार से अधिक ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें 200 को खतरनाक की श्रेणी में रखा गया है। अब अगर सिर्फ उत्तराखंड की बात करें तो इस इलाके में 50 से अधिक ग्लेशियर तेजी से आकार बदल रहे हैं। 2013 की आपदा के बाद से वैज्ञानिक उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में बड़ा ध्यान दे रहे हैं। देहरादून के भू-विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने एक बड़ी चेतावनी जारी कर चुके हैं। उनके मुताबिक ग्लेशियरों के कारण बनने वाली झीलें बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं और झील के टूटने से केदारनाथ जैसी आपदाओं की पुनरावृत्ति हो सकती है।
इधर, पिछले साल चमोली में आई आपदा की भी पहले से ही चेतावनी जारी की गई थी। जीबी पंत हिमालयी संस्थान के हिमायलय वैज्ञानिक डॉ. जेसी कुनियाल का कहना है कि ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन हिमालय के लिए बड़ी समस्या बन रहा है। इसकी वजह से यहां का तामपान बढ़ रहा है। यह कण जब उड़कर हिमालय में जाकर बर्फ से चिपकते हैं तो उनका पिघलना तेजी के साथ शुरू होता है। इस रोकने के लिए राज्य में वनाग्नि की घटनाओं पर लगाम लगाना होगा। उनका कहना है कि बादल फटने की घटनाओं के पीछे भी ग्लोबल वार्मिंग ही बड़ा कारण है।
नहीं सीखा राजनीतिक दलों ने
दो बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस ने आपदाओं से कुछ भी नहीं सीखा है। हिमालय को बचाना प्रमुख मुद्दा होना चाहिए। लेकिन दोनों ही दलों की चिंता में हिमालय नहीं बल्कि हिमालयी राज्य की सत्ता है। इसलिए भाजपा जहां ध्रुवीकरण को प्रमुखता के साथ मुद्दा बनाकर चुनाव जीतना चाह रहा है तो वहीं कांग्रेस ने भी आपदाओं की चिंता करना मुनासिब नहीं समझा। इधर आप के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की छवि ही केदारनाथ आपदा के बाद पुनर्निर्माण के कामों से है। इसके बावजूद अब आप भी इस मुद्दे को नहीं उठा रही है।
हिमालय की बात करने वाली पार्टियां हाशिये पर
राज्य में हिमालय सुरक्षा की बात करने वाली पार्टियां हाशिए पर हैं। इन पार्टियों को एक समय में हरी पार्टियों की संज्ञा दी गई थी। उक्रांद और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी इनमें प्रमुख दल हैं। लेकिन इस तरह की पार्टियां हाशिए पर हैं। इसलिए हिमालय को बचाने का मुद्दा चुनाव आने पर भी ज्यादा सुनाई नहीं देता।
