यूक्रेन संकट के बीच
यूक्रेन को लेकर रूस और पश्चिम के बीच खींचतान जारी है। बड़ी शक्तियां यूक्रेन के भविष्य पर प्रतिद्वंद्विता में व्यस्त हैं, जो शीत युद्ध के दौरान भू-राजनीतिक संघर्ष की याद ताजा करती है। यूक्रेन सीमा पर एक लाख तीस हजार सैनिकों का जमावड़ा करने के बावजूद रूस बार-बार कह रहा है कि यूक्रेन में सैन्य …
यूक्रेन को लेकर रूस और पश्चिम के बीच खींचतान जारी है। बड़ी शक्तियां यूक्रेन के भविष्य पर प्रतिद्वंद्विता में व्यस्त हैं, जो शीत युद्ध के दौरान भू-राजनीतिक संघर्ष की याद ताजा करती है। यूक्रेन सीमा पर एक लाख तीस हजार सैनिकों का जमावड़ा करने के बावजूद रूस बार-बार कह रहा है कि यूक्रेन में सैन्य दखल देने का उसका कोई इरादा नहीं है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की दलील है कि अगर यह सच है तो वह अपने सैनिकों को सीमा पर से हटा ले, मगर रूस इसके लिए तैयार नहीं।
यूक्रेन को लेकर रूस और उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) देशों के बीच बढ़ते तनाव, अफगानिस्तान संकट और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को लेकर चिंताओं के बीच क्वाड समूह के विदेश मंत्रियों ने शुक्रवार को मेलबर्न में व्यापक बातचीत की। क्वाड में भारत और ऑस्ट्रेलिया के अलावा, अमेरिका और जापान शामिल हैं। क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक के पहले चीन ने कहा कि चीन विशेष गुट बनाने और टकराव को उकसाने संबंधी किसी भी कदम को खारिज करता है।
अमेरिका और अन्य संबंधित देश समय के रुख को समझें, उचित मानसिकता रखें और शीत युद्ध की मानसिकता को त्याग दें। दरअसल 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने चीन के कारण उपजती भू-राजनैतिक और भू-रणनीतिक चिंताओं के मद्देनजर, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा भारत के नेतृत्वकर्ताओं के परामर्श से रणनीतिक वार्ता के रूप में क्वाड की शुरुआत की।
क्वाड के इस विचार ने आसियान क्षेत्र में एक मिश्रित प्रतिक्रिया को जन्म दिया एवं चीन और रूस खुले तौर पर इसके विरोध में सामने आए। जबकि क्वाड मुक्त लोकतंत्रों का एक ऐसा नेटवर्क हैं, जो व्यावहारिक सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र समेत विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़े।
दूसरी ओर, रूस के साथ चीन के संबंध मजबूत हो रहे हैं। क्योंकि दोनों पश्चिम से मुकाबला करने के लिए अपनी साझेदारी को मजबूत कर रहे हैं। दोनों देशों ने अपने इरादे को स्पष्ट कर दिया है कि रूस और चीन साथ खड़े हैं। यूक्रेन को लेकर पश्चिम जितना अधिक रूस को अलग-थलग करेगा, मास्को और बीजिंग के बीच संबंध उतने ही घनिष्ठ होंगे।
यह राजनीति भारत के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। चीन भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक चुनौती बना हुआ है। चीन की बढ़ती दादागिरी के मद्देनजर जरूरी है कि हिंद-प्रशांत के सभी छोटे-बड़े देश अपने खुद के रणनीतिक फैसले करने में सक्षम हों। भारत को नए सिरे से रणनीतिक प्रयास तेज करने होंगे ताकि चीन के आक्रामक रवैये को संतुलित किया जा सके।
