वैश्विक संकट

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Edited By Amrit Vichar
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रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के आसन्न खतरे के बाद दुनिया में घबराहट बढ़ी है। यूरोप में शीतयुद्ध के बाद की सुरक्षा व्यवस्था और वहां परंपरागत सैन्य एवं परमाणु बलों की तैनाती पर लंबे समय से निर्धारित सीमा संरचना इस संकट के कारण दांव पर है। अमेरिका यूक्रेन की राजधानी कीव से अपने लगभग …

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के आसन्न खतरे के बाद दुनिया में घबराहट बढ़ी है। यूरोप में शीतयुद्ध के बाद की सुरक्षा व्यवस्था और वहां परंपरागत सैन्य एवं परमाणु बलों की तैनाती पर लंबे समय से निर्धारित सीमा संरचना इस संकट के कारण दांव पर है। अमेरिका यूक्रेन की राजधानी कीव से अपने लगभग सभी दूतावास कर्मियों को वापस बुला रहा है।

मंगलवार को भारत ने भी अपने नागरिकों को यूक्रेन छोड़ने की सलाह दी। अमेरिका, ब्रिटेन और उनके अन्य सहयोगी देश पहले ही कह चुके हैं कि रूसी सैनिक बुधवार तक यूक्रेन तक पहुंच सकते हैं। पश्चिमी देशों ने यूक्रेन संकट का राजनयिक तरीके से हल निकलने की उम्मीद जताई है, तो वहीं दूसरी ओर रूस यूक्रेन पर संभावित आक्रमण की तैयारी करता दिखाई दे रहा है।

हालांकि, रूस यूक्रेन पर आक्रमण की बात से इनकार कर रहा है। यूं तो 1991 के बाद से रूस और यूक्रेन के बीच तनाव लगातार बना ही रहा है, लेकिन हाल के महीनों में ये युद्ध के उस मुहाने तक पहुंच गया जहां तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका तक जताई जाने लगी है। रूस के मुकाबले यूक्रेन कहीं नहीं ठहरता है और यूक्रेन को समर्थन देने के बहाने अमेरिका की मंशा कार्रवाई करने की है।

ध्यान रहे रूस-यूक्रेन जंग भारत के लिए एक साथ कई मुश्किलों को खड़ी करेगा। यूक्रेन संकट के कारण अगर भारत और रूस के रिश्ते प्रभावित होते हैं तो पाकिस्तान के लिए यह मौका होगा। जो भारत के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं होगा। लिहाजा, रूस और यूक्रेन के बीच जंग के हालात में भारत के लिए यह तय करना बहुत मुश्किल होगा कि वह रूस के साथ खड़ा हो या यूक्रेन के साथ।

हर हाल में उसे बीच का रास्ता अपनाना होगा और इस बात की कोशिश करनी होगी कि युद्ध का खतरा किसी भी तरह से टल जाए। क्योंकि युद्ध की परिस्थिति में जो समीकरण बनते दिख रहे हैं, उसमें भारत न तो यूक्रेन के साथ खड़े होने वाले अमेरिका और यूरोप को छोड़ सकता है और न ही यूक्रेन को अपने हिसाब से चलाने की जिद पाले बैठे रूस को।

भारत के लिए सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और न्यूक्लियर सप्ल्यार्स ग्रुप की सदस्यता ज़रूरी है। ऐसे में अमेरिका और रूस के साथ उसके सामरिक संबंध और भी अहम हो जाते हैं। वैसे अब तक भारत बड़ी ताकतों के बीच तनाव में अपने रिश्तों का संतुलन बनाए रखने में कामयाब रहा है। भारत, क्वाड और इसके अलावा अन्य माध्यमों से अपनी हिंद प्रशांत रणनीति पर आगे बढ़ रहा है, जो ये साबित करता है कि भारत सिर्फ़ अपने हितों की पूर्ति के हिसाब से काम करेगा।