मिंस्क समझौते

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Edited By Amrit Vichar
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रूस-यूक्रेन में जारी तनाव पर दुनिया भर की नजर है। पश्चिमी देश यह आशंका जताने में लगे हैं कि रूस कभी भी यूक्रेन पर हमला कर सकता है जबकि रूस लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि उसकी हमले की कोई मंशा नहीं है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सहयोगी देशों ने …

रूस-यूक्रेन में जारी तनाव पर दुनिया भर की नजर है। पश्चिमी देश यह आशंका जताने में लगे हैं कि रूस कभी भी यूक्रेन पर हमला कर सकता है जबकि रूस लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि उसकी हमले की कोई मंशा नहीं है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सहयोगी देशों ने रूस पर आरोप लगाया है कि उसने कुछ सैनिकों के सैन्य अड्डों पर लौटने की बात कह कर विश्व को गुमराह किया। रिपोर्ट के मुतबिक रूस ने यूक्रेन की सीमा के पास अपने डेढ़ लाख सैनिकों को जमा कर रखा है, जिससे यूक्रेन पर आसन्न हमले का अंदेशा पैदा हो गया है।

इस बीच यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में तनाव बढ़ गया है जहां रूस समर्थित अलगाववादी 2014 से यूक्रेनी सैनिकों से लड़ रहे हैं। साथ ही बृहस्पतिवार को लुशांक क्षेत्र में यूक्रेन की गोलाबारी बढ़ गई, जिसे एक उकसावे के तौर पर देखा जा रहा है। उधर रूस ने रूसी सीमा के पास नाटो की सैन्य गतिविधियों पर चिंता जताई है तथा इसे रूस की सुरक्षा को लेकर खतरा बताया है।

अब दुनिया की नजरें मिंस्क समझौता पर आकर टिक गई हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और संयुक्त राष्ट्र (संरा) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के बीच यूक्रेन और रूस के बीच जारी तनाव पर बातचीत के बाद दोनों नेताओं ने मिंस्क समझौते को लागू किए जाने की जरूरत पर बल दिया है। मिंस्क समझौते दो बार हुए थे। पहला सन् 2014 में और दूसरा उसके बाद फरवरी 2015 में।

दोनों ही समझौते बेलारूस की राजधानी मिंस्क में हुए थे। ये समझौते यूक्रेन की सेना और रूसी समर्थक विद्रोहियों के बीच लड़ाई खत्म करने के लिए हुए थे। ऐसे में सामरिक रणनीतिज्ञ मानते हैं मिंस्क-2 ही वह रास्ता है जो रूस को गारंटी देता है कि नाटो कभी भी यूक्रेन को अपनी हदों में शामिल नहीं करेगा।

दरअसल रूस की चिंता भी यही है कि अगर यूक्रेन कहीं, नाटो में शामिल हो गया तो नाटो, अमेरिका, ब्रिटेन सब मिलकर न मालूम कब रूस पर चढ़ाई कर बैठें। हालांकि ये समझौते पूरी तरह कभी लागू नहीं हुए। यानि अपनी बात या अपने तर्क को सही साबित करने की जिद पर दोनों ही पक्ष अड़े हुए हैं।

कहा जा सकता है कि मिंस्क समझौते को नजरंदाज करने वाले दोनों देश अपने-अपने तर्कों को सही मानकर, जिस रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं वह सिर्फ और सिर्फ युद्ध से तबाही और बर्बादी का ही रास्ता है। दोनों देश अगर इस समझौते पर अमल करके आगे बढ़ने की कोशिश करें तो शायद युद्ध की संभावनाओं पर विराम लगाया जा सकता है।