मुरादाबाद : पैडमैन से प्रभावित गौरी जैन बनीं मशाल

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आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। यह जुनून अनायास नहीं है। इसकी एक लंबी फेहरिस्त है, जिसकी बुनियाद सन 2004 में पड़ी। धीरे-धीरे कारवां आगे बढ़ता गया। इस समय 2500 घरों में इसकी रोशनी फैल रही है। अर्थशास्त्र विषय में परास्नातक गौरी जैन मोदीनगर की बेटी और मुरादाबाद की बहू हैं। साल 1994 में पंकज जैन से इनकी …

आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। यह जुनून अनायास नहीं है। इसकी एक लंबी फेहरिस्त है, जिसकी बुनियाद सन 2004 में पड़ी। धीरे-धीरे कारवां आगे बढ़ता गया। इस समय 2500 घरों में इसकी रोशनी फैल रही है। अर्थशास्त्र विषय में परास्नातक गौरी जैन मोदीनगर की बेटी और मुरादाबाद की बहू हैं। साल 1994 में पंकज जैन से इनकी शादी हुई। शहर में इस परिवार की लोगों में अपनी साख है। हालांकि, गौरी जैन के पति वर्ष 2018 में अकाल साथ छोड़ गए। लेकिन, गौरी को समाज सेवा की राह पर चलने की बुनियाद रख गए। वह इंपीरियल सिनेमा के मालिक के रूप में अपना व्यवसाय संभालते थे। अब गौरी बेसहारा और निराश्रित महिलाओं के सपनों में श्रीगणेश की भूमिका निभा रही हैं।

साल 2018 की नौ फरवरी को उनके सिनेमा हाल में अक्षय कुमार द्वारा अभिनीत फिल्म पैडमैन लगी। जिसे पहले उन्होंने देखा, फिर पत्नी के साथ शो में बैठे। फिल्म की कहानी ने दोनों के हृदय झकझोर दिए। उसके बाद पंकज जैन ने महिलाओं के लिए दिन के चारों शो फ्री कर दिए। जबकि फिल्म पैडमैन की कहानी और महिलाओं की जिंदगी के रिश्ते को लेकर गौरी चिकित्सक के तौर पर सोचने लगीं। महिलाओं की इस समस्या ने इससे निजात के बीज गौरी के दिमाग में रोप दिये। वहीं से गौरी ने सेनेटरी पैड्स बनाकर महिलाओं को इस तरह की बीमारियों से राहत दिलाने का बीड़ा उठा लिया। यह अलग बात है की नौ फरवरी को साथ में पैडमैन फिल्म देखने के बाद 14 मार्च को पत्नी का साथ छोड़ दिया। लेकिन, पति के बिछड़ने के गम पर उनका (पंकज जैन) दिलाया गया संकल्प वजनदार साबित हुआ।

तब से पति के सुझाव जिम्मेदारी की राह पर बढ़ाने को प्रेरित कर रहे हैं। गौरी ने अपनी मुहिम में बड़ी बेटी को अपना सहयोगी बना लिया। इंजीनियरिंग डिग्रीधारी बेटी ने महिलाओं को माहवारी के दौरान उत्पन्न होने वाली बीमारियों पर शोध किया और इस निकर्ष पर पहुंचीं कि इस समस्या के स्थायी निदान के लिए ऑर्गेनिक पैड्स बनाए जाएं। तब से गौरी इस तरह ककी समस्याओं से निजात दिलाने का भूत सवार है। गौरी ऐसी समस्या को लेकर छात्राओं को जागरूक करने के लिए विद्यालयों में सेमिनार आयोजित कराने में जुट गईं। 400 से अधिक विद्यालयों में सेमिनार आयोजित करा डाले।

कोरोना काल में 2500 बेटियों को सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने का बीड़ा उठा लिया। एक साल का पैकेज तैयार किया। कुछ स्वयंसेवी संगठनों का साथ मांगा और 800 सालाना खर्च वाले पैड्स के किट तैयार कर दिए। गौरी ने कोरोना काल में 70000 मास्क बनवाने का रिकॉर्ड अपने नाम किया। इस दौरान 30 से 40 महिलाओं की मदद ली, उन्हें पारिश्रमिक दिया। स्वांत: सुखाय और पति की नसीहत को जीवन का हिस्सा बनाने वाली गौरी कहतीं हैं कि हमने गाय के गोबर से 150 वस्तुओं के निर्माण का प्रशिक्षण लिया है। पंचगव्य से लेकर दीपक तक का निर्माण कराती हूं।

गौरी कहती हैं कि शादी के बाद 2004 में हमने बूटीक संचालन शुरू किया, जिसमें महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। उन्हें बुनाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण दिलाया। इस काम में मुझे हरियाणा और पंजाब के शहरों से कच्चा माल मंगाना पड़ता था, उसके बाद 2500 महिलाएं हमारे इस अभियान में सहयोगी बन गईं। मेरठ, मुरादाबाद, रामपुर, टांडा संभल, अमरोहा और आसपास के जिलों की महिलाएं हमारे समूह में हैं। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमने जेल में कैदी का जीवन काट रही महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ा है। 500 से अधिक महिलाएं स्वेटर, टोपी, फ्रॉक और डिजाइनर सूट बनाती हैं। इसमें उन्हें 200 से 300 रुपये तक पारिश्रमिक मिल जाता है।

गौरी के प्रयासों का सिलसिला अभी यहीं नहीं थमा। वह इको फ्रेंडली होली के प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहीं हैं। गाय के गोबर से उपला बनाने के अभियान में जुटी हैं। गोबर के इस उत्पाद का बाजार मेरठ, मुरादाबाद, गाजियाबाद और मोदी नगर तक पहुंच चुका है। वह कहती हैं कि हम गोशालाओं से सूखा गोबर खरीदते हैं। उससे तमाम उत्पाद तैयार करते हैं। पिछले साल शहर में इनके द्वारा तैयार कराए गए उपले से 200 स्थान पर इको फ्रेंडली होलिका दहन किया। अब गौरी लावारिस और बेसहारा लाशों के अंतिम संस्कार में अपनी नई भूमिका के साथ तैयार हैं। यानी कि ऐसी लाशों के दाह संस्कार के लिए गाय के गोबर के उपले उपलब्ध कराएंगी।

शवदाय गृहों को निशुल्क उपले की आपूर्ति करेंगी। कहती हैं कि यह हमारे सफर का आखिरी पड़ाव नहीं है। लोगों का साथ और समाज का मार्गदर्शन लेकर हमें और आगे बढ़ना है। हम अपने कारोबार से महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के प्रयासों को आगे बढ़ाएंगे। अंतिम सांस तक बेसहारा महिलाओं के कटीले रास्तों को सुगम और आसान बनाने के लिए आगे बढ़ते जाना है। शायद ऐसे लोगों के लिए शायर लिखता है- यह आदमी नहीं मुकम्मल बयान है, माथे पर इसके जख्म के गहरे निशान है…।

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