लामबंदी जारी

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से पूरी दुनिया में चिंता है। इसका असर केवल यूक्रेन या रूस तक सीमित नहीं होगा बल्कि यूरोप की सीमाओं से परे भी अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में है। दक्षिण एशिया भी इससे अप्रभावित नहीं रहेगा। यानि युद्ध का असर इसके खत्म होने के बाद लंबे समय तक …

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध से पूरी दुनिया में चिंता है। इसका असर केवल यूक्रेन या रूस तक सीमित नहीं होगा बल्कि यूरोप की सीमाओं से परे भी अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में है। दक्षिण एशिया भी इससे अप्रभावित नहीं रहेगा। यानि युद्ध का असर इसके खत्म होने के बाद लंबे समय तक महसूस किया जाएगा। 11 वें दिन भी यूक्रेन के शहरों पर रूसी बमबारी जारी है जबकि 14 लाख यूक्रेनियों ने पड़ोसी देशों में शरण ली है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि यह सिर्फ यूक्रेन पर हमला नहीं है, बल्कि यूरोप की सुरक्षा और वैश्विक शांति और स्थिरता पर भी हमला है। रूस के खिलाफ अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों को और सख्त करने की बात कर रहा है।

साथ ही अमेरिका यूक्रेन के पड़ोसी देशों को रूस के विरुद्ध लामबंद करने में लगा है। सोवियत गणराज्य में शामिल रह चुके और पश्चिमी देशों की ओर झुकाव रखने वाले मोल्दोवा को अमेरिका ने रविवार को समर्थन देने का वादा किया है। मोल्दोवा की यात्रा पर गए अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने यह वादा किया। मोल्दोवा ने रूस के संभावित हमले के मद्देनजर सुरक्षा मुहैया कराने की अपील की थी। मोल्दोवा के साथ सोवियत संघ के एक अन्य पूर्व राज्य जॉर्जिया ने भी यूरोपीय संघ की सदस्यता लेने के लिए आवेदन किया हुआ है। जबकि अमेरिका व पश्चिमी देशों की यूक्रेन को नाटो में शामिल करने की जिद भी कहीं न कहीं इस संघर्ष की वजह रही है, जिसके चलते रूस को लगता था कि नाटो उसके दरवाजे पर आ सकता है।

फिर भी युद्ध किसी विवाद का समाधान नहीं कहा जा सकता। रूस-यूक्रेन संघर्ष निस्संदेह मानवीय त्रासदियों में इजाफा ही करेगा। चूंकि युद्ध कभी भी शांति का विकल्प नहीं हो सकता। यूक्रेन संकट को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के अनुसार हल किया जाना चाहिए। उम्मीद है कि युद्ध जल्द से जल्द समाप्त होगा। भारत ने इस चुनौती पूर्ण समय में संयुक्त राष्ट्र आम सभा व सुरक्षा परिषद में जहां अपने दूरगामी हितों को ध्यान में रखा है, वहीं यूक्रेन की संप्रभुता की भी वकालत की है। भले ही भारत ने निंदा प्रस्ताव का समर्थन न किया हो, मगर रूसी हमले की वकालत भी नहीं की है। हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और बड़ी शक्तियों से मौजूदा संकट को हल करने पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह करना चाहिए।