भारत-चीन वार्ता
दुनिया के लिए रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध चिंता का कारण बना हुआ है। ऐसे में चीन के रक्षा बजट में अप्रत्याशित वृद्धि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। चीन की इस तैयारी से हमारी वह चिंता और बढ़ जाती है, जो पिछले दो साल से एलएसी पर बनी …
दुनिया के लिए रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध चिंता का कारण बना हुआ है। ऐसे में चीन के रक्षा बजट में अप्रत्याशित वृद्धि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। चीन की इस तैयारी से हमारी वह चिंता और बढ़ जाती है, जो पिछले दो साल से एलएसी पर बनी हुई है। 14 दौर की सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता के बाद भी समस्या का निर्णायक समाधान नहीं निकला है।
विकास दर में कमी के बावजूद रक्षा खर्च में वृद्धि बताती है कि चीन की प्राथमिकताएं क्या हैं और रक्षा पर खर्च बढ़ाकर चीन संदेश क्या देना चाहता है? सोमवार को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा था कि उनके देश और भारत को पिछले कुछ साल में ‘थोड़ी मुश्किलों का सामना’ करना पड़ा है जो दोनों देशों के बुनियादी हितों में नहीं है।
इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछले महीने कहा था कि सीमा पर सैन्य बलों को नहीं भेजने के समझौतों का बीजिंग द्वारा उल्लंघन किए जाने के बाद चीन के साथ भारत का रिश्ता इस समय ‘बहुत मुश्किल दौर’ से गुजर रहा है। म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में जयशंकर ने कहा था कि भारत एलएसी पर चीन के साथ समस्या का सामना कर रहा है।
ऐसे में सैन्य गतिरोध को दूर करने के लिए भारत और चीन के कोर कमांडरों के बीच 11 मार्च को 15 वें दौर की बातचीत होगी।
मुद्दों का परस्पर स्वीकार्य समाधान निकालने के बारे में दोनों पक्षों की ओर से दिए गए वक्तव्य उत्साहजनक और सकारात्मक ही कहे जा सकते हैं। ध्यान रहे14वें दौर की वार्ता चीन के मोल्डो में हुई थी।
इसमें हाट स्प्रींग एरिया, उत्तर और दक्षिण पैंगोंग साे, गउवन और गोगरा हाट स्प्रींग एरिया को लेकर बातचीत हुई थी। इस वार्ता में दोनों देशों ने तय किया था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बहाली और गतिरोध को दूर करने के लिए वार्ता से मुंह नहीं फेरा जाएगा। शुक्रवार को होने वाली 15 वें दौर की बातचीत में सभी विवादों को सुलझा लिया जाएगा ये अभी तय नहीं है।
क्योंकि अरूणाचल प्रदेश व पूर्वी लद्दाख में पिछले करीब दो वर्ष से चले आ रहे विवाद को लेकर चीन अड़ियल रुख अपनाता रहा है। चीन के अड़ियल रवैये में किस तरह का बदलाव आने वाला है? इस सवाल का जवाब समय के गर्भ में है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि रक्षा तैयारियों का दीर्घकालिक एजेंडा इन संवेदनशील मसलों पर सहमति बनाने की राह में आड़े नहीं आएगा। भारत को एलएसी के विवादों के निपटारे के लिए कूटनीतिक विकल्प भी खुले रखने चाहिए।
