रामपुर : कल से 25 मार्च तक नहीं हो सकेंगे कोई शुभ कार्य
रामपुर, अमृत विचार। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलिका दहन तक की अवधि को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है। यह अवधि इस वर्ष 10 से 17 मार्च अर्थात होलिका दहन तक है। होलाष्टक के दौरान गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, विवाह संबंधी वार्तालाप, सगाई, विवाह, किसी नए कार्य, नींव आदि रखने, नया …
रामपुर, अमृत विचार। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलिका दहन तक की अवधि को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है। यह अवधि इस वर्ष 10 से 17 मार्च अर्थात होलिका दहन तक है। होलाष्टक के दौरान गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, विवाह संबंधी वार्तालाप, सगाई, विवाह, किसी नए कार्य, नींव आदि रखने, नया वाहन एवं आभूषण आदि खरीदने, नया व्यवसाय आरंभ करने या किसी भी मांगलिक कार्य आदि का आरंभ शुभ नहीं माना जाता तथा 16 संस्कार भी नहीं किए जाते। नवविवाहिता को पहली होली मायके की बजाय ससुराल में मनानी चाहिए।
शास्त्रों की मान्यता के अनुसार कामदेव द्वारा भगवान शिव की तपस्या भंग करने से रुष्ट होकर शिव जी ने उसे फाल्गुन की अष्टमी तिथि के दिन भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने शिव की आराधना करके कामदेव को पुनर्जीवित करने की याचना की जो उन्होंने स्वीकार कर ली। महादेव के इस निर्णय के बाद जन साधारण ने हर्ष मनाया और होलाष्टक का अंत धुलैंडी को हो गया। इसी परम्परा के कारण होलाष्टक के 8 दिन शुभ कार्यों के लिए वर्जित माने गए हैं। होलाष्टक के बाद चैत्र माह कृष्ण पक्ष शुरू हो रहा है। ऐसे में अंधियारा पाक होगा, लिहाजा शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं।
25 मार्च को है बासौड़ा-शीतला अष्टमी
चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला अष्टमी मनाई जाती है। शीतला अष्टमी को बसौड़ा अष्टमी भी कहते हैं। बसौड़ा शीतला माता को समर्पित लोकप्रिय त्योहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार ये त्योहार होली के आठवें दिन पड़ता है। मान्यता के अनुसार इस दिन पूजा के समय माता शीतला को खासतौर पर मीठे चावलों का भोग लगाया जाता है। ये चावल गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं। कहा जाता है कि शीतला अष्टमी के दिन पूरे विधि विधान के साथ पूजा करने से बीमारियों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख शांति बनी रहती है। इस वर्ष शीतला अष्टमी 25 मार्च 2022, दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन माता शीतला की विधि-विधान से पूजा की जाती है और व्रत भी रखा जाता है। बासौड़ा पूजन के बाद ही होलाष्टक में रोके गए शुभ कार्य शुरू होते हैं।
होलाष्टक का यह है ज्योतिषीय कारण
इसका ज्योतिषीय कारण है कि अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव के हो जाते हैं। इनके निर्बल होने से मानव मस्तिष्क की निर्णय क्षमता क्षीण हो जाती है और इस दौरान गलत फैसले लेने के कारण हानि की संभावना रहती है। इस अवसाद को दूर रखने के लिए इन 8 दिनों में मन में उल्लास लाकर वातावरण को जीवंत बनाने के लिए लाल या गुलाबी रंग का प्रयोग विभिन्न तरीकों से किया जाता है। लाल रंग के परिधान मन में उत्साह उत्पन्न करते हैं इसीलिए उत्तर प्रदेश में आज भी होली का पर्व एक दिन नहीं अपितु 8 दिन मनाया जाता है।
विज्ञान के अनुसार
पूर्णिमा के दिन ज्वारभाटा जैसी आपदा आती रहती है और व्यक्ति उग्र हो जाता है। ऐसे में सही निर्णय नहीं हो पाता।
यह जातक रहें सतर्क
जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा, वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं, उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए। ये अष्ट ग्रह, दैनिक कार्यकलापों पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।
होली से पूर्व अष्टमी तिथि को होलाष्टक लग जाएंगे। कोई शुभकार्य नहीं होंगे। बासौड़ा पूजन के बाद ही शुभ कार्य होंगे। चैत्र नवरात्र में दो अप्रैल से शुभकार्य हो सकेंगे। ऐसे में शुभकार्य करने से बचना चाहिए। –पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्रा, पुजारी महालक्ष्मी मंदिर चाह सोतियान।
