आत्मनिर्भरता के लिए
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच गुरुवार से दवाइयों के दाम भी बढ़ गए। 875 तरह की दवाओं की कीमत 10 फीसदी तक बढ़ी हैं। इनमें दर्दनाशक और एंटी वायरल दवाओं के अलावा कई तरह के एंटीबायोटिक्स भी शामिल हैं। दवाएं महंगी होने से मरीजों पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। दवाओं का उत्पादन करने में जिस …
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच गुरुवार से दवाइयों के दाम भी बढ़ गए। 875 तरह की दवाओं की कीमत 10 फीसदी तक बढ़ी हैं। इनमें दर्दनाशक और एंटी वायरल दवाओं के अलावा कई तरह के एंटीबायोटिक्स भी शामिल हैं। दवाएं महंगी होने से मरीजों पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।
दवाओं का उत्पादन करने में जिस कच्चे माल की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है उसे एक्टिव फार्मास्यूटिकल्स इनग्रेडिएंट्स यानी एपीआई कहा जाता है। 90 प्रतिशत एपीआई की खरीद चीन से की जाती थी। एपीआई, जिसे ड्रग्स भी कहा जाता है, दवाओं के निर्माण में उपयोग किया जाने वाला प्रमुख कच्चा माल है।
दरअसल चीन में कोरोना महामारी और अन्य वजहों से एपीआई की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इस पर जर्मनी और सिंगापुर से दवाओं का कच्चा माल लाया जा रहा है। चीन के मुकाबले इसकी कीमत अधिक होने के कारण कीमतों में वृद्धि हुई है। दूसरी ओर भारत के लिए अपने विशाल क्षमता वाले दवा उद्योग के लिए कच्चे माल को लेकर चीन पर निर्भरता सालों से चिंता का विषय रही है।
पहले भी इस मामले में चीन के पास भारत से सौदेबाजी करने की क्षमता होने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। पहले डोकलाम गतिरोध के मद्देनजर जब द्विपक्षीय संबंध काफी बिगड़ गए थे तो चिंताएं और भी गंभीर हो गईं। 2020 के शुरुआती महीनों में चीन में कोविड लॉकडाउन, जिसने भारत में दवाओं के कच्चे माल की कमी की आशंकाओं को और बढ़ाया और फिर लद्दाख में उपजे गतिरोध ने देश को एपीआई में जल्द से जल्द आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए प्रेरित किया।
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुई झड़प के बाद भारत को अंदेशा हो गया था कि तनाव की स्थिति में चीन से जरूरी कच्चे माल की सप्लाई बाधित हो सकती है, वैसे भी चीन का थोक दवा उद्योग गाहे-बगाहे दामों में हेर-फेर करने की रणनीति अपनाता रहा है। इसलिए देश ने आत्मनिर्भर होने की दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया के मुताबिक, दवाओं के उत्पादन के लिए बेहद जरूरी 53 तरह के कच्चे माल में से 35 तरह के एपीआई का उत्पादन भारत में शुरू कर दिया गया है, जिससे कि देश को चीन या अन्य देशों पर निर्भर न रहना पड़े। आयात पर निर्भरता घटाने के लिए आत्मनिर्भरता की बढ़ाए कदम गए हैं। क्योंकि किसी भी मामले में निर्भरता कूटनीति कमजोरी मानी जाती है। इसलिए भारत थोक-दवाओं के संबंध में आत्मनिर्भर बनने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
