चिंता की बात

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Edited By Amrit Vichar
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संयुक्त राष्ट्र के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने कहा है कि दुनिया भर की लगभग 99 प्रतिशत आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जो अंतरर्राष्ट्रीय स्वीकृत मानकों से ज्यादा प्रदूषित है। इससे लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर नकारात्मक असर पड़ता है। दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत शहरी इलाकों से एकत्र प्रदूषण संबंधी आंकड़ों से मालूम …

संयुक्त राष्ट्र के चिकित्सा वैज्ञानिकों ने कहा है कि दुनिया भर की लगभग 99 प्रतिशत आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जो अंतरर्राष्ट्रीय स्वीकृत मानकों से ज्यादा प्रदूषित है। इससे लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर नकारात्मक असर पड़ता है। दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत शहरी इलाकों से एकत्र प्रदूषण संबंधी आंकड़ों से मालूम होता है कि लगभग हर व्यक्ति, हृदय की बीमारियों, आघात, फेफड़ों की बीमारियों, कैंसर और न्यूमोनिया के बढ़े हुए खतरों की चपेट में है।

वायु प्रदूषण से दक्षिण एशिया के शहरों में असमय मौत का आंकड़ा अधिक है। जर्नल साइंस एडवांस में प्रकाशित अनुसंधान के मुताबिक वर्ष 2005 से 2018 के बीच भारत के आठ शहरों मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई, सूरत, पुणे और अहमदाबाद में एक लाख अतिरिक्त लोगों की असमय मौत हुई है। पिछले माह स्विस फर्म द्वारा जारी विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के शीर्ष 15 सबसे प्रदूषित शहरों में से 10 अकेले भारत में हैं और इनमें से ज्यादातर शहर दिल्ली के आसपास हैं।

वहीं अगर दुनिया के 100 सबसे प्रदूषित शहरों की बात करें तो इनमें से 63 अकेले भारत में हैं और इनमें से ज्यादातर शहर उत्तर प्रदेश और हरियाणा में हैं। शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा विकसित वायु गुणवत्ता सूचकांक बताता है कि यदि दिल्ली और लखनऊ का वायु गुणवत्ता का स्तर डब्ल्यूएचओ के मानकों को पूरा करे तो यहां के निवासी की आयु एक दशक और बढ़ सकती है।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि वायु गुणवत्ता में तेजी से गिरावट औद्योगिक और घरेलू स्रोतों जैसे सड़क परिवहन, कूड़ा जलाने, बड़े पैमाने पर चारकोल और लकड़ी का इस्तेमाल करने से हो रहा है। भारत में वायु प्रदूषण सिर्फ तकनीकी चुनौती का ही विषय नहीं है बल्कि हमारी आर्थिक यात्रा और राष्ट्रीय आकांक्षाओं का भी परिणाम है। देश में गहन निगरानी नेटवर्क है जिसका परिचालन स्थानीय और राष्ट्रीय अधिकारियों के साथ-साथ अनुसंधान संस्थानों द्वारा किया जाता है।

2021 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाक़ों में वायु प्रदूषण के स्तर पर नज़र रखने का काम वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को सौंपा गया है। इस संस्था को अर्थशास्त्रियों, चिकित्सकों, सामाजिक विज्ञानियों, छोटे उद्यमियों और वैज्ञानिकों के ज्ञान का लाभ उठाना चाहिए। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में वायु प्रदूषण के मुद्दे को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है। इसके बावजूद जमीन पर उम्मीद के मुताबिक नतीजे देखने को नहीं मिल रहे हैं। दरअसल वायु प्रदूषण से निपटने के लिए इसके कारणों, प्रभावों और असर से जुड़ी सभी जटिलताओं को ध्यान में रखना होगा। इसके लिए राज्यों के बीच रणनीतिक गठजोड़ तैयार करना होगा।