संकट की आहट
कोयले की कमी के चलते देश में बिजली संकट की आहट सुनाई दे रही है। कई राज्यों में रोजाना आठ से दस घंटे की बिजली कटौती हो रही है। कम से कम 12 राज्यों के थर्मल पॉवर प्लांट में कोयले के स्टॉक में कमी आई है। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, झारखंड और हरियाणा में …
कोयले की कमी के चलते देश में बिजली संकट की आहट सुनाई दे रही है। कई राज्यों में रोजाना आठ से दस घंटे की बिजली कटौती हो रही है। कम से कम 12 राज्यों के थर्मल पॉवर प्लांट में कोयले के स्टॉक में कमी आई है। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, झारखंड और हरियाणा में बिजली की आपूर्ति में कटौती की जा रही है। उत्तरी राज्यों में राजस्थान और उत्तर प्रदेश का सबसे बुरा हाल है।
हरियाणा ने अपने ताप बिजली घरों के लिए 10 सालों में पहली बार कोयले के आयात का फैसला किया है। राजस्थान के सभी सात थर्मल प्लांट में कोयले की कमी है। इन प्लांटों से 7580 मेगावाट बिजली पैदा होती है। उत्तर प्रदेश के चार थर्मल पावर प्लांट में से तीन में कोयले की कमी है। इन स्टेशनों से 6129 मेगावाट बिजली बनती है।
उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग 21 हजार मेगावाट तक पहुंच गई है और आपूर्ति 19 से 20 हजार मेगावाट के आसपास है। हालांकि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते आयातित कोयले के दामों में बढ़ोतरी के साथ-साथ बिजली घरों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलवे के वैगनों की पर्याप्त उपलब्धता न होने को भी समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
कोल सचिव एके जैन का कहना है कि देश में कोयले की कमी नहीं है। तो फिर समस्या कहां है। जैन का कहना है कि देश के कई राज्यों में कोयले का संकट न होकर बिजली की मांग और आपूर्ति का बेमेल होना है। फिर भी बिजली उत्पादक कंपनियों से अब कोयला आयात करने को कहने से ही अंदाजा लगता है कि क्षेत्र का प्रबंधन किस प्रकार हो रहा है।
यानि मौजूदा संकट सरकारी एजेंसियों के बीच खराब तालमेल और योजना के कारण उपजा है। लगता तो यही है कि घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाया जाएगा और आने वाले दिनों में हालात सुधरेंगे। लेकिन भारत की समस्या कोयले तक सीमित नहीं है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं।
प्राकृतिक गैस के दाम भी बढ़े हैं। वैश्विक कारणों से निकट भविष्य में भी कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं। वैसे भी गर्मी के मौसम में बिजली की मांग बढ़ना कोई नई बात नहीं है।
हालात बता रहे हैं कि यह संकट आसानी से खत्म नहीं होने वाला। ऐसे में सवाल उठता है कि जब पता है कि पिछले कई सालों से यह समस्या बनी हुई है, तो फिर इससे निपटने के लिए अब तक ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?
