जैव विविधता दिवस : रंग लाई उत्तराखंड वानिकी अनुसंधान संस्थान की मेहनत, 1943 स्थानिक पौधों की प्रजातियों को किया संरक्षित… देखें VIDEO
हल्द्वानी, अमृत विचार। भले ही सूचना तकनीक के इस दौर में हम आज इस बात पर गर्व करें कि मनुष्य प्रजाति किसी पर आश्रित नहीं किंतु यह भी सत्य है कि ऐसे बहुत से कारण हैं जिनके लिए हम जैव विविधता पर निर्भर हैं। बैक्टीरिया से लेकर विशालकाय जीव जंतु और वनस्पति मानव जीवन को …
हल्द्वानी, अमृत विचार। भले ही सूचना तकनीक के इस दौर में हम आज इस बात पर गर्व करें कि मनुष्य प्रजाति किसी पर आश्रित नहीं किंतु यह भी सत्य है कि ऐसे बहुत से कारण हैं जिनके लिए हम जैव विविधता पर निर्भर हैं। बैक्टीरिया से लेकर विशालकाय जीव जंतु और वनस्पति मानव जीवन को सुगम बनाने के साथ ही विकास के सहभागी हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए वनस्पति और वन्यजीवों की सभी प्रजातियां जरूरी है। जंगल में विविधता होने पर ही जैव विविधता दिखेगी। उत्तराखंड इस मामले में काफी समृद्ध है।

आज जैव विविधता दिवस के अवसर पर हल्द्वानी स्थित उत्तराखंड वानिकी अनुसंधान संस्थान में महिला महाविद्यालय की वनस्पति विज्ञान की शोधार्थियों और एमएससी की छात्राओं के बीच जैव विविधता पर आधारित पेंटिग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।
देखें वीडियो: उत्तराखंड वानिकी अनुसंधान संस्थान की मेहनत लाई रंग
वनस्पति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एसडी तिवारी के निर्देशन में आईं छात्राओं ने पर्यावरण, जीव जंतु और मानव जीवन को दर्शाती एक से बढ़कर एक पेंटिंग्स बनाई। इस मौके पर डीएफओ (रिसर्च) कुंदन कुमार ने संरक्षित प्रजातियों के लिए वार्षिक रिपोर्ट जारी की।

इस दौरान डीएफओ (रिसर्च) कुंदन कुमार ने प्रतिभागी छात्राओं से बायो डायवर्सिटी को लेकर सवाल जवाब किए और उत्कृष्ट पेंटिंग बनाने वाली छात्राओं को प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया। उन्होंने बताया कि साल 2021-22 में राज्य के छह केंद्रों हल्द्वानी, रानीखेत, पिथौरागढ़, गोपेश्वर और देहरादून में कुल 1943 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है। जबकि पिछले साल संरक्षित प्रजातियों की संख्या 1576 थी।

डीएफओ (रिसर्च) कुंदन कुमार ने बताया कि इस वर्ष हमारा लक्ष्य स्थानिक प्रजातियों का संरक्षण करना था। स्थानीय प्रजातियां वैसी प्रजातियां होती हैं जो केवल एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में पायी जाती हैं। और दुनिया में किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं पाई जाती। ऐसे में यदि वे अपने प्राकृतिक वासस्थल से विलुप्त हो जाते हैं तो इनका अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। उन्होंने बताया कि अधिकांश प्रजातियों को पहले से ही विभिन्न प्रकार के जैविक हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण संकटग्रस्त प्रजातियों में सूचीबद्ध किया गया है। ऐसे में जैव विविधता की दृष्टि से पौधों के साथ-साथ जीवों को संरक्षित करना जरूरी है। डीएफओ (रिसर्च) कुंदन कुमार ने बताया कि अब तक उत्तराखंड और देश की कुल 56 स्थानिक पौधों की प्रजातियों का संरक्षण किया जा चुका है।

बताते चलें कि वन अनुसंधान केंद्र में एक जैव विविधता पार्क और गैलरी विकसित की गई है। 18 एकड़ जमीन में बने जैव विविधता पार्क में 500 से अधिक वनस्पति की प्रजातियां लगाई गई हैं। इस पार्क में धार्मिक, आध्यात्मिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी वाटिका, बुद्ध वाटिका और पुलवामा शहीद वाटिका भी बनाई गई हैं। इस बायो डायवर्सिटी पार्क में 40 से ज्यादा औषधीय पौधों की भी प्रजातियां भी शामिल हैं। आपको इस बात की जानकारी भी मिलेगी कि मानव शरीर के किस अंग के लिए कौन से वनस्पति का औषधीय महत्व है।
वहीं बायोडायवर्सिटी गैलरी में थ्रीडी के माध्यम से वनस्पतियों और वन्यजीवों की फोटो समेत पूरी जानकारी को विस्तार से दर्शाया गया है। गैलरी में विलुप्त होते 101 जीव-जंतुओं के साथ-साथ दुर्लभ वनस्पतियों को शामिल किया गया है। जुरासिक काल की वनस्पतियों की जानकारी के लिए यहां एक जुरासिक पार्क भी तैयार किया है और एक संग्रहालय भी है जिसमें तराई से लेकर हिमालय क्षेत्रों की मिट्टी, पत्थर और जंगली मसालों को संग्रहित किया गया है।
बायो डायवर्सिटी गैलरी में दुनिया की सबसे बड़ी तितली हो या फिर किंग कोबरा का घोंसला… ऐसे दुर्लभ वन जीवों और वनस्पतियों के यहां दीदार होते हैं। ऐसे में स्कूली बच्चों के साथ-साथ शोधकर्ताओं के लिए वन अनुसंधान केंद्र की यह पहल किसी सौगात से कम नहीं है।
