चीन को झटका

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Edited By Amrit Vichar
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बदलती विश्व व्यवस्था में हाल ही में संपन्न क्वाड सम्मेलन के बाद से चिंतित चीन को एक बड़ा झटका लगा है। चीन 10 प्रशांत राष्ट्रों के साथ व्यापक नए सुरक्षा समझौते करने में नाकाम रहा है। सम्मेलन के बाद से क्वाड का तोड़ निकालने में जुटा चीन कई देशों को अपने साथ जोड़ने की योजना …

बदलती विश्व व्यवस्था में हाल ही में संपन्न क्वाड सम्मेलन के बाद से चिंतित चीन को एक बड़ा झटका लगा है। चीन 10 प्रशांत राष्ट्रों के साथ व्यापक नए सुरक्षा समझौते करने में नाकाम रहा है। सम्मेलन के बाद से क्वाड का तोड़ निकालने में जुटा चीन कई देशों को अपने साथ जोड़ने की योजना बना रहा है। इसी के चलते चीन के विदेशमंत्री वांग यी ने प्रशांत द्वीप देशों का दस दिवसीय दौरा शुरू किया। विदेश मंत्री वांग सोलोमन द्वीप भी गए, जिसने हाल ही में तीन क्वाड सदस्यों-अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान की आपत्तियों के बावजूद चीन के साथ एक सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

क्वाड में इन देशों के साथ भारत भी शामिल है। चीन के इस कदम से अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया दोनों ही तनाव में आ गए थे। क्योंकि ये सभी द्वीप हिंद प्रशांत क्षेत्र में बहुत अहम भू-रणनीतिक महत्व रखते हैं। प्रशांत महासागर के सभी द्वीप ऑस्ट्रेलिया के पूर्वोत्तर में स्थित हैं। यह वही जगह है जहां से अमेरिका के गुआम द्वीप से ऑस्ट्रेलिया के बीच जंगी जहाज गुजरते हैं। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही इस बात से चिंतित हैं कि दक्षिण चीन सागर में आक्रामक रुख अपना रहा चीन अब अपनी पहुंच को प्रशांत महासागर में बढ़ा रहा है। हालांकि चीन यह दावा कर रहा है कि उसका सोलोमन द्वीप में कोई सैन्य अड्डा बनाने का इरादा नहीं है।

सोलोमन द्वीप ऑस्ट्रेलिया से मात्र 1600 किलोमीटर दूर है। चीनी विदेश मंत्री भले ही कुछ भी दावा करें लेकिन यह आशंका पैदा हो गई है कि चीन अपनी सेना को सोलोमन द्वीप भेज सकता है और सैन्य अड्डा भी बना सकता है। वांग को उम्मीद थी कि बैठक में 10 द्वीप राष्ट्र पूर्व-लिखित समझौते का समर्थन करेंगे। परंतु वांग इस पर सभी को सहमत नहीं कर पाए। गौरतलब है कि चीन और प्रशांत महासागर के दस देशों के बीच बने मसौदा प्रस्ताव में कहा गया है कि प्रशांत महासागर के ये देश सुरक्षा, निगरानी, साइबर सुरक्षा और आर्थिक विकास के क्षेत्रों में काम करेंगे।

जबकि प्रशांत नेताओं ने कहा कि वह योजना का समर्थन नहीं करेंगे। यह अनावश्यक रूप से भू-राजनीतिक तनाव को बढ़ाएगा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा उत्पन्न करेगा। इससे प्रशांत द्वीपीय देशों की संप्रभुता भी प्रभावित होगी। सबसे बढ़कर इस समझौते पर हस्ताक्षर न करके इन देशों ने इस हकीकत को समझा कि इससे वैश्विक संतुलन लड़खड़ा जाएगा और चीन बनाम पश्चिमी देशों के बीच नया शीत युद्ध शुरु हो जाएगा।